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Lord Krishna's Flute: बांसुरी में बसते हैं श्रीकृष्ण के प्राण, जानें शिव जी से कैसे है इसका संबंध

Wed, 16 Oct 2024 04:55 PM IST
ज्योति मेहरा माया कुलश्रेष्ठ
माया कुलश्रेष्ठ Published by: ज्योति मेहरा Updated Wed, 16 Oct 2024 04:55 PM IST
सार

बांसुरी के बारे में यह कहना या बताना संभव नहीं है कि यह सर्वप्रथम कब से आया पौराणिक कथाओं की माने तो श्री कृष्ण के द्वारा ही उसका जन्म हुआ, बांसुरी स्वर की निष्पत्ति जब करती है तो यह सम्मोहन और जीवन ऊर्जा से भरी हुई है।

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Interesting facts of lord krishna bansuri know who gave flute to Lord Krishna
Lord Krishna's Flute - फोटो : freepik

विस्तार

ताल पर नाचे राधा बावरिया बांसुरी बजाए मोरा सांवरिया, अक्सर जब हम श्रीकृष्ण के रास की बात करते हैं, तो यह संभव ही नहीं है कि हम श्री कृष्ण को बिना बांसुरी के देख पाए। कहा जाता है की बांसुरी और श्री कृष्ण एक दूसरे के साथ वैसे ही है, जैसे कि राधा -कृष्णl आज भी श्री कृष्ण का रास बिना बांसुरी के संभव नहीं है। आज हम बात करेंगे संगीत के सबसे प्राचीन वाद्य की।

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यह सोचना और जानना उतना ही अद्भुत और अलौकिक है, की एक संगीत का ऐसा वाद्य यंत्र जो सिर्फ एक बांस से निर्मित है और इसमें पूर्ण संगीत समाया हुआ है, बांसुरी के बारे में यह कहना या बताना संभव नहीं है कि यह सर्वप्रथम कब से आया पौराणिक कथाओं की माने तो श्री कृष्ण के द्वारा ही उसका जन्म हुआ, बांसुरी स्वर की निष्पत्ति जब करती है तो यह सम्मोहन और जीवन ऊर्जा से भरी हुई है। बांसुरी के बारे में विस्तार से जानने के लिए विश्व प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित अजय प्रसन्ना से बात हुई।
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"बांसुरी' श्री कृष्ण का प्रिय संगीत वाद्य है, कहा जाता है के श्री कृष्ण के प्राण बांसुरी में बसते थे। यह अन्य वाद्य से इसलिए भी अलग है क्योंकि इसकी बनावट बांस की है और इसको बजाने से पहले किसी भी तरह से ट्यून नहीं किया जा सकता, इसको पूर्णता संपूर्ण ज्ञान के साथ ही बजाया जा सकता है।
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कुछ कथाओं की मानें तो बांसुरी की परिकल्पना भी शिव ने ही की थी और यह संभव भी है क्यूंकि शंकर नृत्य ,और नाद के देव है।शिव जी ने उस दधीचि की हड्डी को घिसकर एक सुंदर एवं मनोहर बांसुरी का निर्माण किया। जब शिव जी भगवान श्री कृष्ण से मिलने गोकुल पहुंचे तो उन्होंने श्री कृष्ण को भेट स्वरूप वह बंसी प्रदान की। उन्हें आशीर्वाद दिया तभी से भगवान श्री कृष्ण उस बांसुरी को अपने पास रखते हैं।

पंडित अजय प्रसन्ना और बांसुरी की यात्रा
जब उनका जन्म हुआ तभी से वह बांसुरी सुनते आ रहे थे क्योंकि उनके पिताजी एक विश्व प्रसिद्ध बांसुरी वादक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन बांसुरी के लिए समर्पित किया और 3 साल की उम्र से ही अजय प्रसन्ना की यात्रा शुरू हुई। प्रथम समय में जब गुरु  शिष्य परंपरा के अंतर्गत उनकी शिक्षा शुरू की गई, तब उनके पिताजी पंडित भोलानाथ प्रसन्ना ने अपने हाथों से बांसुरी बनाकर  पंडित अजय प्रसन्ना की शिक्षा शुरू की।


नाट्यशास्त्र के अनुसार यह 2000 साल से भी पुराना शास्त्र है, जिसमें नृत्य, गीत, वादन कहा जा सकता है। सभी मंची कलाओं का शास्त्र है इसलिए इसे पंचम वेद भी कहते हैं। इसकी रचना भरत मुनि ने की। उन्होंने ऋग्वेद से पाठ यजुर्वेद से अभिनय सामवेद से गीत अथर्ववेद से रस लेकर पंचम वेद की रचना की उन्होंने संगीत वादन को चार समूह में बनता है। अवनद्ध वाद्य, घन वाद्य, सुशिर वाद्य और तार वाद्य। बांसुरी को सुशिर वाद्य माना गया क्योंकि इसमें पवन के नियंत्रण से ही स्वर की निष्पत्ति होती है।

माया कुलश्रेष्ठ
 

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