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Vat Savitri Vrat 2025: पति की लंबी आयु के लिए स्त्रियों का संकल्प, अमर प्रेम का प्रतीक वट सावित्री व्रत

Mon, 26 May 2025 08:04 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 26 May 2025 08:04 AM IST
सार

Vat Savitri Vrat 2025: आज सुहागिनों का सबसे बड़ा पर्व वट सावित्री व्रत है। यह व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं।

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Vat Savitri Vrat 2025 Fast Tradition and Significance Husband Long Life and Eternal Love
वट सावित्री व्रत - फोटो : adobe stock

विस्तार

Vat Savitri Vrat 2025: आज देश के कई हिस्सों में वट सावित्री व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व होता है। यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। जिसमें सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। पत्नी के अटूट प्रेम, निष्ठा और सतीत्व की महिमा का पर्व वट सावित्री व्रत आज है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उत्तर भारत में तथा ज्येष्ठ पूर्णिमा को दक्षिण भारत में मनाया जाता है। व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं और देवी सावित्री के पतिव्रत धर्म, त्याग और तपस्या का स्मरण करती हैं। यह पर्व न केवल सौभाग्यवर्धक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है।
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1. व्रत का धार्मिक महत्व
वट सावित्री व्रत सौभाग्य, संतति, सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं वटवृक्ष की पूजा करती हैं, जिसे भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का प्रतीक माना गया है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शंकर का वास बताया गया है। इस वृक्ष को देवी सावित्री का रूप मानकर पूजन किया जाता है। सावित्री ने इसी वटवृक्ष की छांव में अपने मृत पति को यमराज से वापस प्राप्त किया था।
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2. व्रत की विधि और पूजन सामग्री
इस दिन महिलाएं बांस की टोकरी में सप्तधान्य पर ब्रह्मा-ब्रहमसावित्री तथा सत्यवान-सावित्री की प्रतिमा स्थापित करती हैं। लाल वस्त्र, सिंदूर, रोली, मोली, अक्षत, पुष्प, फल, मिठाई और भीगे हुए चने से पूजा की जाती है। वटवृक्ष की जड़ों में जल और दूध अर्पित कर तने पर सात बार कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा की जाती है। इस दिन यमराज की भी पूजा की जाती है क्योंकि उन्होंने ही चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को लौटाए थे।
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3. देवी सावित्री की अद्भुत कथा
भविष्य पुराण के अनुसार सावित्री राजा अश्वपति की कन्या थीं। उन्होंने सत्यवान को वर के रूप में चुना, जबकि नारद मुनि ने भविष्यवाणी की थी कि सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के कुछ समय बाद जब सत्यवान की मृत्यु का समय आया, तो यमराज उनके प्राण लेने आए। सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती गईं और अपने पतिव्रत धर्म की महिमा से यमराज को प्रसन्न कर सत्यवान के प्राण पुनः प्राप्त कर लिए।

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4. वटवृक्ष की पूजा का पर्यावरणीय संदेश
वट सावित्री व्रत केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है, यह पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है। वटवृक्ष को अनश्वर माना जाता है, इसकी लम्बी उम्र और घना विस्तार इसे विशेष बनाता है। इसके पूजन के बहाने वृक्षारोपण और वृक्ष संरक्षण का संदेश भी समाज तक पहुंचता है। जब वृक्ष होंगे, तभी पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और जीवन संभव होगा।

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5. व्रत की अवधि और क्षेत्रीय परंपराएं
उत्तर भारत में यह व्रत अमावस्या को किया जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को व्रत करती हैं, जबकि कई महिलाएं त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन का उपवास रखती हैं। यह व्रत भारत के विविध क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार किया जाता है, लेकिन सभी में उद्देश्य एक ही होता है अटल सुहाग की कामना और देवी सावित्री के त्याग को नमन।


 
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