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Varuthini Ekadashi 2025: वरूथनी एकादशी कल, जानिए इसका महत्व और पूजाविधि

Wed, 23 Apr 2025 11:48 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 23 Apr 2025 11:48 AM IST
सार

Varuthini Ekadashi 2025: पद्मपुराण के अनुसार वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से उतना पुण्य प्राप्त होता है जितना कन्यादान, तप और यज्ञ आदि करने से मिलता है। यह एकादशी परलोक और इस लोक में सौभाग्य प्रदान करने वाली है।

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Varuthini Ekadashi 2025 - फोटो : adobe

विस्तार

Varuthini Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। वर्ष में आने वाली 24 एकादशियों में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'वरुथिनी एकादशी' कहा जाता है। यह तिथि न केवल आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है, बल्कि सांसारिक जीवन में भी सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद देने वाली मानी गई है। शास्त्रों में कहा गया है कि वैशाख मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है और एकादशी तिथि तो स्वयं ही श्रीहरि को समर्पित है, अतः जब ये दोनों संयोग में आते हैं, तब उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस बार वरुथिनी एकादशी 24 अप्रैल को पड़ रही है। इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है।

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वरूथनी एकादशी का महत्व
पद्मपुराण के अनुसार वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से उतना पुण्य प्राप्त होता है जितना कन्यादान, तप और यज्ञ आदि करने से मिलता है। यह एकादशी परलोक और इस लोक में सौभाग्य प्रदान करने वाली है। मनुष्य वरूथनी एकादशी का व्रत करके विद्यादान का फल प्राप्त कर लेता है। विशेष रूप से यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है जो जीवन में किसी शारीरिक, मानसिक या आर्थिक कष्ट से गुजर रहे हो। इसके प्रभाव से साधक को न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि उसे अंततः भगवान विष्णु के लोक वैकुण्ठ की प्राप्ति भी होती है।
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व्रत और पूजा की विधि
वरुथिनी एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि के पश्चात व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की पीताम्बरधारी मूर्ति या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। फिर उन्हें रोली, मोली, पीला चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतुफल और मिष्ठान अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर आरती करें। दिनभर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’मंत्र का जाप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना इस दिन अत्यंत पुण्यदायी होता है। व्रत के दौरान पूरी श्रद्धा से उपवास करें, फलाहार लें और वाणी व व्यवहार में संयम रखें। क्रोध, निंदा, झूठ और द्वेष से दूर रहें। रात को जागरण करके जो भगवान मधुसूदन का पूजन करते हैं, वह सभी पापों से मुक्त हो परमगति को प्राप्त होते हैं।  

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पौराणिक कथा
कथा के अनुसार, प्राचीन काल में मान्धाता नामक एक राजा नर्मदा नदी के तट पर तपस्या कर रहे थे। तप में लीन राजा पर अचानक एक जंगली भालू ने हमला कर दिया और उनके पैर को चबाने लगा। राजा ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। प्रभु तत्काल प्रकट हुए और भालू का वध कर राजा की रक्षा की। लेकिन राजा का पैर नष्ट हो चुका था जिससे वे अत्यंत दुःखी थे। तब भगवान ने उन्हें वरुथिनी एकादशी का व्रत करने का परामर्श दिया। राजा ने विधिपूर्वक व्रत किया, वराह अवतार की पूजा की और व्रत के प्रभाव से उनका शरीर पुनः सुंदर हो गया। मृत्यु के बाद उन्हें विष्णु लोक की प्राप्ति हुई।

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