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Utpanna Ekadashi 2024: उत्पन्ना एकादशी पर जरूर करें ये काम, भगवान विष्णु का मिलेगा आशीर्वाद

Tue, 19 Nov 2024 07:40 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Tue, 19 Nov 2024 07:40 AM IST
सार

Utpanna Ekadashi 2024: मार्गशीर्ष माह को व्रत-त्योहारों की दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। इस महीने में गीता जयंती, विनायक चतुर्थी और विवाह पंचमी जैसे पर्व मनाए जाते हैं।

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Utpanna Ekadashi 2024 date and puja vidhi know kab hai Utpanna Ekadashi vrat
Utpanna Ekadashi 2024 - फोटो : freepik

विस्तार

Utpanna Ekadashi 2024: मार्गशीर्ष माह को व्रत-त्योहारों की दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। इस महीने में गीता जयंती, विनायक चतुर्थी और विवाह पंचमी जैसे पर्व मनाए जाते हैं। इस माह में उत्पन्ना एकादशी का व्रत भी रखा जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'उत्पन्ना एकादशी' कहलाती है। इस दिन विष्णु जी की पूजा और उपवास रखने से साधक के सभी दुखों का नाश होता है।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी एकादशी ने राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस दिन उनकी आराधना करने से परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली का वास होता है। इस साल मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 25 नवंबर को रात 1 बजकर 47 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 26 नवंबर को पूरे दिन रहेगी। ऐसे में 26 नवंबर 2024 को ही उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन प्रीति योग का निर्माण हो रहा है, जो दोपहर 2 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। इस योग में विष्णु चालीसा का पाठ करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे में आइए इस चालीसा के बारे में जानते हैं।

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विष्णु चालीसा

दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

चौपाई 
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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