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Sheetla Ashtami 2025: शीतला अष्टमी पर जानिए पर्व का महत्व, पूजा विधि, कथा और मंत्र
Sat, 22 Mar 2025 06:48 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 22 Mar 2025 06:48 AM IST
सार
शीतला माता देवी पार्वती का ही स्वरूप हैं जिन्हें, शीतलता और रोग नाशिनी देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत सौम्य होता है।
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शीतला अष्टमी 2025: यह पर्व स्वास्थ्य, स्वच्छता और आध्यात्मिक शांति का संदेश देता है
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Sheetla Ashtami 2025: शीतला अष्टमी, जिसे बासोड़ा भी कहा जाता है, होली के आठवें दिन मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण लोक पर्व है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है और उन्हें ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाता है। यह पर्व स्वास्थ्य, स्वच्छता और आध्यात्मिक शांति का संदेश देता है। आमतौर पर इसे चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, लेकिन इस बार अष्टमी तिथि 22 मार्च, शनिवार को पड़ रही है, जिसे 'कड़ा' वार माना जाता है। इसलिए, यह पर्व 21 मार्च, शुक्रवार को सप्तमी तिथि में ही मनाया जाएगा। श्रद्धालु शीतला माता की पूजा करके और ठंडे पकवानों का भोग लगाकर इस पर्व को मनाते हैं, जिससे उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी।
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शीतला माता का स्वरूप और महत्व
शीतला माता देवी पार्वती का ही स्वरूप हैं जिन्हें, शीतलता और रोग नाशिनी देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत सौम्य होता है, वे गधे की सवारी करती हैं और उनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते होते हैं। स्कंद पुराण में शीतला माता का उल्लेख मिलता है और मान्यता है कि उनकी पूजा करने से चेचक, फोड़े-फुंसी, महामारी और गर्मी से संबंधित रोगों से बचाव होता है।
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पकवानों का विशेष महत्व
शीतला सप्तमी की पूर्व संध्या को 'राधा पुआ' कहा जाता है। इस दिन घरों में पूरी, गुड़, मीठे चावल, बेसन की रोटी, कढ़ी, बाजरे की रोटी आदि पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। अगले दिन माता को ठंडे पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है और स्वयं भी बासी भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि माता को ठंडा भोजन प्रिय है और इससे शरीर को गर्मी से राहत मिलती है।
शीतला माता की कथा
एक कथा के अनुसार, प्रताप नगर नामक गांव में लोग शीतला माता की पूजा कर रहे थे। पूजा के दौरान गाँव वालों ने गर्म नैवैद्य माता शीतला को अर्पित कर दिए, जिससे देवी नाराज हो गईं और गांव में भयंकर आग लग गई। हालांकि, गांव में एक बुजुर्ग महिला का घर सुरक्षित रहा। जब लोगों ने उससे कारण पूछा तो उसने बताया कि वह माता को ठंडा प्रसाद अर्पित करती थी। इस परंपरा को देखने के बाद गांववालों ने निर्णय लिया कि हर वर्ष इस दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित किया जाएगा और तभी से यह पर्व सप्तमी और अष्टमी तिथि को मनाया जाने लगा।
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शीतला देवी का मंत्र-
वन्देहं शीतलां देवीं सर्वरोग भयापहम।
यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत्।।
अर्थात-हे मां भगवती शीतला मेरा प्रणाम स्वीकार करें,सभी प्रकार के भय और रोगों का नाश करने वाली मां शीतला आप मुझे आशीष दें।आपकी शरण में जाने से चेचक जैसे बड़े से बड़े रोग दूर हो जाते हैं।
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