Gudi Padwa 2025: हिंदू नववर्ष को गुड़ी पड़वा क्यों कहते हैं? घर के आगे क्यों बांधी जाती है गुड़ी
gudi padwa 2025 : इस बार 30 मार्च 2025 को विक्रम संवत 2082 प्रारंभ होगा और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार को समाप्त होगा। आओ जानते हैं कि इसे गुड़ी पड़वा क्यों कहते हैं।
विस्तार
Gudi Padwa 2025 Date And Time: आज से नया हिंदू नववर्ष आरंभ हो गया है। हिंदू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। इसे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, पंजाब में बैसाखी, सिंध में चेटीचंड, दक्षिण भारत में युगादि, उगादि और पुथांडु, आंध्र में उगादिनाम, जम्मू-कश्मीर में नवरेह, केरल में विशु, असम में रोंगली बिहू नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र और हिंदी भाषी क्षेत्र में इसे गुड़ी पड़वा और नव संवत्सर के नाम से जाना जाता है। इस बार 30 मार्च 2025 को विक्रम संवत 2082 प्रारंभ होगा और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार को समाप्त होगा। आइए जानते हैं कि इसे गुड़ी पड़वा क्यों कहते हैं।
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गुड़ी पड़वा का अर्थ
गुड़ी पड़वा दो शब्दों से मिलकर बना हैं। जिसमें गुड़ी का अर्थ होता हैं विजय पताका और पड़वा का मतलब होता है प्रतिपदा।
गुड़ी क्यों स्थापित करते हैं?
मराठी समाज गुड़ी को बनाकर उसकी पूजा करके घर के द्वारा पर ऊंचे स्थान पर उसे स्थापित करते हैं। प्राचीन समय में जब योद्धा युद्ध जीत कर आते थे तो घर और महल के द्वार पर विजय पताका के रूप में ध्वज लगाते थे। तभी से चैत्र प्रतिपदा के दिन नववर्ष और विजय उत्सव के रूप में यह प्रचलन चला आ रहा है।
गुड़ी की सामग्री
एक डंडा, रेशमी साड़ी या चुनरी, पीले रंग का कपड़ा, फूल, फूलों की माला, कड़वे नीम के पांच पत्ते, आम के पांच पत्ते, रंगोली, प्रसाद और पूजा सामग्री।
घर और द्वार की सजावट
गुड़ी पड़वा के अनुष्ठान सूर्योदय से पहले आरंभ हो जाता है लोग प्रातः जल्दी उठकर शरीर पर तेल लगाने के बाद स्नान करते हैं। नित्यकर्म से निवृत्त होकर घर और द्वार की सुंदर सजावट की जाती है। घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बनाकर लगाया जाता है और सुंदर फूलों से द्वार को सजाया जाता है। इसके साथ ही रंगोली बनाई जाती है।
कैसे बनाते हैं गुड़ी
- गुड़ी के लिए लकड़ी का एक दंड लें। दंड को साफ धो लें और उसके ऊपर रेशमी कपड़ा या साड़ी बांधें।
- इसके बाद एक नीम की टहनी, आम के पांच पत्ते, एक फूलों की माला, एक शक्कर की माला को लगाएं और उसके ऊपर से तांबा पितल या चांदी का लोटा या गिलास रखें।
- अब जिस स्थान पर गुड़ी लगानी हो उस स्थान को साफ और स्वच्छ कर लें और स्थान के पास नीचे रंगोली बना लें।
- रंगोली के ऊपर एक पाट रखा जाता है और उसके ऊपर वह दंड रखा जाता है।
- तैयार गुड़ी को घर के दरवाजे पर, ऊंची छत पर या गैलरी में यानि किसी ऊँचे स्थान पर लगाई जाती है।
गुड़ी की पूजा
1. गुड़ी को अच्छी तरह से बांधकर और उस पर सुगंध, फूल और अगरबत्ती लगाकर दीपक से गुड़ी की पूजा करते हैं।
2. फिर दूध-चीनी, पेड़े का प्रसाद अर्पित करते हैं। इसके बाद दोपहर के समय गुड़ी को मीठा प्रसाद अर्पित करते हैं।
3. इस दिन परंपरा के अनुसार श्रीखंड-पुरी या पूरन पोली का भोग लगाया जाता है।
4. शाम को सूर्यास्त के समय हल्दी-कुमकुम, फूल, अक्षत आदि अर्पित करके गुड़ी को उतारा जाता है।
5. इस दिन कड़वे नीम का सेवन आरोग्य के लिए अच्छा माना जाता है।
6. मीठे नीम की पत्तियां प्रसाद के तौर पर खा कर इस त्योहार को मनाने की शुरुआत करते हैं।
7. नीम की पत्तियों, गुड़ और इमली मिलाकर चटनी भी बनायी जाती है।
8. इस दिन श्रीखंड का सेवन करना बहुत शुभ माना जाता है।
9. इस दिन पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं जैसे पूरन पोली, पुरी और श्रीखंड, खीर, मीठे चावल जिन्हें लोकप्रिय रूप से शक्कर भात कहा जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।