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Sharad Purnima Vrat Katha 2025: शरद पूर्णिमा का क्या है धार्मिक महत्व और जानिए इससे जुड़ी व्रत कथा
Mon, 06 Oct 2025 06:23 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 06 Oct 2025 06:23 AM IST
सार
Sharad Purnima Vrat Katha 2025: शरद पूर्णिमा पर चांद 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन मां लक्ष्मी और चंद्रदेव की विशेष रुप से पूजा करने का विधान होता है। शरद पूर्णिमा की रात को इससे जुड़ी व्रत कथा का पाठ जरूर सुनना चाहिए।
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करवा चौथ व्रत कथा 2025
- फोटो : adobe
विस्तार
Sharad Purnima Vrat Katha 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। यह वर्ष की सबसे शुभ और पवित्र पूर्णिमा मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर आकाश में उदित होता है और माना जाता है कि उसकी किरणों से अमृत बरसता है। इसी कारण इस दिन को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव की पूजा के साथ-साथ मां लक्ष्मी और चंद्र देवता की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। इसके अलावा इस दिन व्रत कथा का पाठ करना बहुत ही जरूरी माना जाता है।
शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और उन घरों में स्थायी रूप से निवास करती हैं, जहाँ लोग जागरण कर उनका ध्यान और पूजन करते हैं। इसीलिए इस दिन लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस रात जागरण करता है, वह वर्षभर सुख, समृद्धि और धन-धान्य से संपन्न रहता है। इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना भी शुभ माना गया है, क्योंकि चंद्रमा को शीतलता और मानसिक शांति का प्रतीक माना गया है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रकिरणों में अमृत तत्व होता है। इसलिए परंपरा रही है कि इस रात को दूध और चावल से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे रखा जाता है, ताकि उसमें चंद्र किरणों का अमृत रस समाहित हो सके। अगले दिन यह खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है, जो स्वास्थ्य और सौभाग्य दोनों प्रदान करती है।
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शरद पूर्णिमा पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ महारास किया था। कहा जाता है कि उस दिव्य रास में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से प्रत्येक गोपी के साथ अलग-अलग रूप में नृत्य किया। यह प्रेम, भक्ति और आत्मा के ईश्वर से मिलन का प्रतीक माना गया। इसी कारण इस पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
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एक अन्य कथा के अनुसार एक साहुकार की दो पुत्रियां थीं। दोनों ही पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत करती थीं। परन्तु बड़ी पुत्री व्रत पूरे विधि-विधान से रखती थी, जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। परिणामस्वरूप, छोटी पुत्री की संतान जन्म लेते ही मर जाती थी। छोटी पुत्री ने जब पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया, “तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा करती हो, यही कारण है कि तुम्हारी संतान जीवित नहीं रह पाती। यदि तुम पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से करोगी तो संतान जीवित रहेगी।”
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पंडितों की सलाह पर उसने पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक किया। उसके बाद उसके घर पुत्र पैदा हुआ, परन्तु वह भी शीघ्र ही मर गया। छोटी पुत्री ने मृत बालक को एक पीढ़े पर लिटा दिया और ऊपर से कपड़ा ढक दिया। फिर उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाकर वही पीढ़ा बैठने के लिए दिया। जब बड़ी बहन बैठने लगी तो उसका घाघरा बच्चे को छू गया। उसी क्षण बालक रोने लगा। बड़ी बहन ने कहा, “तू मुझे कलंकित करना चाहती थी। यदि मैं इस पर बैठ जाती तो यह मर जाता।” तब छोटी बहन ने उत्तर दिया, “बहन! यह पहले से ही मृत था। तेरे भाग्य और पुण्य के कारण ही यह जीवित हुआ है।”उस घटना के बाद नगर भर में ढिंढोरा पिटवाया गया कि पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करना चाहिए।
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शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और उन घरों में स्थायी रूप से निवास करती हैं, जहाँ लोग जागरण कर उनका ध्यान और पूजन करते हैं। इसीलिए इस दिन लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस रात जागरण करता है, वह वर्षभर सुख, समृद्धि और धन-धान्य से संपन्न रहता है। इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना भी शुभ माना गया है, क्योंकि चंद्रमा को शीतलता और मानसिक शांति का प्रतीक माना गया है।
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शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रकिरणों में अमृत तत्व होता है। इसलिए परंपरा रही है कि इस रात को दूध और चावल से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे रखा जाता है, ताकि उसमें चंद्र किरणों का अमृत रस समाहित हो सके। अगले दिन यह खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है, जो स्वास्थ्य और सौभाग्य दोनों प्रदान करती है।
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शरद पूर्णिमा पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ महारास किया था। कहा जाता है कि उस दिव्य रास में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से प्रत्येक गोपी के साथ अलग-अलग रूप में नृत्य किया। यह प्रेम, भक्ति और आत्मा के ईश्वर से मिलन का प्रतीक माना गया। इसी कारण इस पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
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एक अन्य कथा के अनुसार एक साहुकार की दो पुत्रियां थीं। दोनों ही पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत करती थीं। परन्तु बड़ी पुत्री व्रत पूरे विधि-विधान से रखती थी, जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। परिणामस्वरूप, छोटी पुत्री की संतान जन्म लेते ही मर जाती थी। छोटी पुत्री ने जब पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया, “तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा करती हो, यही कारण है कि तुम्हारी संतान जीवित नहीं रह पाती। यदि तुम पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से करोगी तो संतान जीवित रहेगी।”
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