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Pradosh Vrat 2021: गुरु प्रदोष व्रत आज, इस मुहूर्त में भूलकर भी न करें पूजा, जानिए महत्व और पूजा विधि

Thu, 05 Aug 2021 12:48 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 05 Aug 2021 12:48 PM IST
सार

गुरुवार के दिन किया जाने वाला व्रत गुरु प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन शत्रुओं पर विजय पाने और उनके नाश के लिए इस पावन व्रत को किया जाता है।

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sawan guru pradosh vrat august 2021 do not worship lord shankar in these muhurat
गुरु प्रदोष व्रत 2021 मुहूर्त: प्रदोष व्रत करने के लिए जल्दी सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करें और भगवान शिव को जल चढ़ाकर भगवान शिव का मंत्र जपें। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज सावन माह का प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। प्रदोष व्रत हर महीने के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर आता है। इस बार यह 5 अगस्त, गुरुवार को है। गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। प्रदोष व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा आराधना की जाती है। सावन के महीने में प्रदोष व्रत का महत्व काफी बढ़ जाता है, क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव की प्रिय महीना होता है। सावन के महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा आराधना व जलाभिषेक करने से हर मनोकामना पूरी होती है। 
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प्रदोष व्रत का महत्व
वार के अनुसार पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व होता है। सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम् या चन्द्र प्रदोषम् भी कहा जाता है। इस दिन साधक अपनी अभीष्ट कामना की पूर्त्ति के लिए शिव की साधना करता है। मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोषम् कहा जाता है और इसे विशेष रूप से अच्छी सेहत और बीमारियों से मुक्ति की कामना से किया जाता है। बुधवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला होता है। गुरुवार के दिन किया जाने वाला व्रत गुरु प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन शत्रुओं पर विजय पाने और उनके नाश के लिए इस पावन व्रत को किया जाता है। शुक्रवार के  दिन पड़ने वाले व्रत को शुक्र प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत से सुख-समृद्धि और सौभाग्य का वरदान मिलता है। शनिवार के  दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहा जाता है। इस दिन इस पावन व्रत को पुत्र की कामना से किया जाता है। रविवार के दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत लंबी आयु और आरोग्य की कामना से किया जाता है।
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प्रदोष व्रत में शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान दिया जाता है। आइए जानते हैं किन मुहूर्तों में नहीं करना चाहिए।

आज ( 05 अगस्त 2021) के अशुभ मुहूर्त-
राहुकाल - दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से 03 बजे तक। 
यमगंड- सुबह 06 बजे से 07 बजकर 30 मिनट तक।
गुलिक काल- सुबह 09 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक। 

प्रदोष व्रत की पूजा विधि 
प्रदोष व्रत करने के लिए जल्दी सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करें और भगवान शिव को जल चढ़ाकर भगवान शिव का मंत्र जपें। इसके बाद पूरे दिन निराहार रहते हुए प्रदोषकाल में भगवान शिव को शमी, बेल पत्र, कनेर, धतूरा, चावल, फूल, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी आदि चढ़ाएं। 
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प्रदोष व्रत की कथा
प्राचीन समय की बात है, एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था उसके यहाँ से कभी भी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्नी स्वयं काफ़ी दुखी थे क्यों कि उनके कोई संतान नहीं थी। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप कर चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी। मगर सेठ पति-पत्नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति-पत्नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूँ वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई।हे रुद्रदेव शिव नमस्कार। शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥ हे नीलकंठ सुर नमस्कार। शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥ हे उमाकान्त सुधि नमस्कार। उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ईशान ईश प्रभु नमस्कार। विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। व्रत के प्रभाव और शिवजी की कृपा से सेठ की पत्नी ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। 
 
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