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Nirjala Ekadashi Katha: जानिए निर्जला एकादशी व्रत कथा, महत्व और क्यों है यह सबसे श्रेष्ठ एकादशी ?

Fri, 06 Jun 2025 09:06 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 06 Jun 2025 09:06 AM IST
सार

Nirjala Ekadashi Vrat Katha in hindi: प्रत्येक एकादशी की अलग-अलग कथा और महत्व होता है, लेकिन निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन कथा पढ़ने और व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु अति प्रसन्न होते हैं।

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Nirjala Ekadashi Vrat Katha Story 2025 Importance Puja Vidhi Niyam and Daan Upay in Hindi
निर्जला एकादशी का कथा का महत्व - फोटो : adobe stock

विस्तार

Nirjala Ekadashi Vrat Katha: एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अति प्रिय है। वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं, लेकिन जब पुरुषोत्तम मास आता है, तब इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी की अलग-अलग कथा और महत्व होता है, लेकिन निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन कथा पढ़ने और व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु अति प्रसन्न होते हैं।

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निर्जला एकादशी की कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार शौनक आदि ऋषियों ने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी की कथा जानने की इच्छा व्यक्त की। तब सूतजी ने बताया कि एक बार भीमसेन ने महर्षि व्यास से कहा हे पितामह! मेरे परिवार के सभी सदस्य एकादशी को व्रत करते हैं, परंतु मैं बिना भोजन किए नहीं रह सकता। मेरा पेट अग्नि के समान है, जो अधिक भोजन से ही शांत होता है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं व्रत का पुण्य भी पा सकूं और भूखा भी न रहूं। महर्षि व्यास ने कहा -हे भीमसेन! यदि तुम पूरे वर्ष केवल एक व्रत करना चाहते हो, तो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जल रहकर उपवास करो। इस दिन जल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। केवल आचमन के लिए 6 माशे (लगभग 24 मिली) से अधिक जल न लें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक बिना जल के व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।
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भीमसेन ने साहसपूर्वक इस व्रत को किया। व्रत के प्रभाव से वे अचेत हो गए। तब उन्हें गंगाजल, तुलसी चरणामृत और प्रसाद देकर होश में लाया गया। तभी से यह व्रत भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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निर्जला एकादशी व्रत का महत्व
एकादशी स्वयं विष्णुप्रिया है इसलिए इस दिन निर्जल व्रत, जप-तप, दान-पुण्य करने से प्राणी श्री हरि का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। निर्जला एकादशी के इस महान व्रत को 'देवव्रत' भी कहा जाता है क्योंकि सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि अपनी रक्षा और जगत के पालनहार श्री हरि की कृपा प्राप्त करने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी में ब्रह्महत्या सहित समस्त पापों का शमन करने की शक्ति होती है,इस दिन मन,कर्म,वचन द्वारा किसी भी प्रकार का पाप कर्म करने से बचने का प्रयास करना चाहिए,साथ ही तामसिक आहार के सेवन से भी दूर रहना चाहिए।

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