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Narak Chaturdashi 2021: जानिए क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी और क्या है तेल-उबटन से स्नान का महत्व ?

Sat, 30 Oct 2021 11:24 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद
अनीता जैन ,वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 30 Oct 2021 11:24 AM IST
सार

कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी को मनाए जाने वाले पर्व को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी (Narak chaturdashi 2021), छोटी दीपावली (diwali 2021), नरक निवारण चतुर्दशी अथवा काली चौदस( Kali Chaudas) के रूप में भी जाना जाता है।

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narak chaturdashi 2021 why do we celebrate narak chaturdashi and significance
नरक चतुर्दशी 2021: धार्मिक मान्यता है कि तेरस, चौदस और अमावस्या के दिन दीपक जलाने से यम के प्रकोप से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में लक्ष्मीजी की कृपा बनी रहती है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Narak Chaturdashi 2021: कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी को मनाए जाने वाले पर्व को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी (Narak chaturdashi 2021), छोटी दीपावली (diwali 2021), नरक निवारण चतुर्दशी अथवा काली चौदस( Kali Chaudas) के रूप में भी जाना जाता है। दीपावली के पांच दिनों के त्योहार में यह पर्व धनतेरस( Dhanteras 2021) के बाद मनाया जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करके यम तर्पण एवं शाम के समय दीप दान का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि तेरस, चौदस और अमावस्या के दिन दीपक जलाने से यम के प्रकोप से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में लक्ष्मीजी की कृपा बनी रहती है।

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नरकासुर का किया वध
धार्मिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में नरकासुर राक्षस ने अपनी शक्तियों से देवताओं और ऋषि-मुनियों को बंदी बना लिया था एवं साथ ही 16 हज़ार एक सौ सुंदर राजकुमारियों को भी बंधक बना लिया। नरकासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवता और साधु-संत भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए। नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध किया और उसकी कैद से 16 हजार एक सौ कन्याओं को आजाद कराया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः भगवान आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। बाद में ये सभी भगवान श्री कृष्ण की 16 हजार एक सौ पटरानियां के तौर पर जानी जाने लगीं। नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में देवगण व पृथ्वीवासी बहुत आनंदित हुए और उन्होंने यह पर्व मनाया। माना जाता है कि तभी से इस पर्व को मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई। इस दिन श्रीकृष्ण की विशेष पूजा की जाती है और उनके इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
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वसुदेव सुत देवं, नरकासुर मर्दनमः । देवकी परमानन्दं, कृष्णम वंदे जगत गुरुम ।।

इसलिए लगाते हैं तेल और उबटन?
जब भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया, तो वध करने के बाद उन्होंने तेल और उबटन से स्नान किया था। तभी से इस दिन तेल लगाकर स्नान की यह प्रथा शुरू हुई। ऐसा माना जाता है कि यह स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग व सौंदर्य की प्राप्ति होती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार नरकासुर के कब्जे में रहने के कारण सोलह हज़ार एक सौ कन्याओं के उदार रूप को  फिर से कांति श्रीकृष्ण ने प्रदान की थी,इसलिए इस दिन महिलाएं तेल के उबटन से स्नान कर सोलह शृंगार करती हैं। माना जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन जो महिलाएं 16 श्रृंगार करती हैं,  उन्हें सौभाग्यवती और सौंदर्य का श्रीकृष्ण की पत्नी देवी रुक्मणी से आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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ज्योतिष में है महत्व
ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि नरक चतुर्दशी के दिन स्नान और उबटन के माध्यम से ग्रहों की शांति के उपाय भी कर सकते हैं। इस दिन स्नान के जल में ग्रहों से संबंधित वस्तुओं को मिलाकर स्नान करने से ग्रहों का अशुभ प्रभाव दूर होता है।


 
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