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Muharram Day of Ashura 2020: रोज-ए-अशुरा, जानें इस्लाम मजहब में क्या है इसका महत्व
Fri, 28 Aug 2020 01:07 PM IST
रुस्तम राणा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुस्तम राणा
Updated Fri, 28 Aug 2020 01:07 PM IST
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ताजिया के जुलूस में उमड़े अकीदतमंद।
- फोटो : सोशल मीडिया
रोज-ए-अशुरा इस्लाम मजहब का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार 29 अगस्त को मनाया जाएगा। रोज-ए-अशुरा इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम का दसवां दिन होता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, रोज-ए-अशुरा को मोहम्मद हुसैन के नाती हुसैन की शहादत के दिन रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को शिया और सुन्नी दोनों मुस्लिम समुदाय के लोग अपने-अपने तरीके से मनाते हैं।
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जहां सुन्नी समुदाय इस महीने की 9 और 10 तारीख को भी रोजा रखते हैं। वहीं शिया समुदाय के लोग इस महीने में 1 से 9 तारीख तक रोजा रखने की छूट होती है। लेकिन 10वें दिन रोजा रखना हराम माना जाता है। शिया मुसलमान इस दिन जुलूस में हिस्सा लेते हैं और इमाम हुसैन के ताजिया को ले जाते हैं।
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इस्लाम मजहब की मान्यता के अनुसार, कहा जाता है कि रोज-ए-अशुरा के दिन इमाम हुसैन का कर्बला की लड़ाई में सिर कलम कर दिया था और उनकी याद में इस महीने के 10वें दिन जुलूस निकाला जाता है। शिया समुदाय में ये सिलसिला पूरे 2 महीने और 8 दिनों तक चलता है।
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मुहर्रम का चांद दिखाई देने के बाद शिया महिलाएं और लड़कियां अपनी चूड़ियां तोड़ देती हैं। साथ ही वो शृंगार की चीजों से 2 महीने 8 दिनों के लिए दूरी बना लेती हैं। मुहर्रम के महीने में शिया समुदाय के लोग किसी तरह की खुशी नहीं मनाते हैं न ही उनके घरों में 2 महीने 8 दिनों के लिए कोई शादी होती है। साथ ही वो किसी अन्य के यहां खुशी के मौके पर शामिल भी नहीं होते हैं।
रोज-ए-अशुरा के दिन तैमूरी रिवायत को मानने वाले मुसलमान रोजा-नमाज के साथ इस दिन ताजियों-अखाड़ों को दफन या ठंडा कर शोक मनाते हैं। इस दिन मस्जिदों पर फजीलत और हजरते इमाम हुसैन की शहादत पर विशेष तकरीरें होती हैं। मस्जिदों में नफिल नमाजें अदा कर रोजा रखकर शाम को इफ्तार किया जाता है। घरों में किस्म-किस्म के खाने बनाए जाते हैं।