Janmashtami 2020: कैसे और किसने किया कृष्ण और बलराम का नामकरण
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ऋषि गर्ग यदुवंश के कुलगुरु थे, एक दिन वे गोकुल में पधारे। नंदबाबा और यशोदा जी ने पूरे भाव से उनका आदर सत्कार किया और वासुदेव देवकी का हाल चाल पूछा। उसके बाद जब उन्होंने गर्गाचार्य से गोकुल में पधारने का कारण पूछा तब उन्होंने बताया कि वे पास ही के गांव में एक बालक का नामकरण करने आएं हैं। रास्ते में तुम्हारा घर पड़ा तो विचार किया कि तुमसे भी मिलता चलूं। जब नंदबाबा और यशोदा जी ने सुना तो उन्होंने गर्ग ऋषि से कहा कि बाबा हमारे यहां भी दो बालकों ने जन्म लिया है, कृपा करके उनका भी नामकरण कर दीजिए।
लेकिन गर्गाचार्य ने मना कर दिया उन्होंने कहा कि अगर इस बात का पता कंस को चल गया तो वह मुझे जीवित नहीं रहने देगा। इसपर नंदबाबा ने कहा कि आप चुपचाप गौशाला में नामकरण कर दीजिए हम इस बात का जिक्र किसी से नहीं करेंगे
जब माताओं मे ली ऋषिगर्ग की परीक्षा
जब रोहिणी जी को अवगत हुआ कि यदुवंश के कुल पुरोहित आए हैं, तो वे भावविभोर होकर उनके गुणों का बखान करने लगी। तभी यशोदा ने कहा कि अगर गर्गाचार्य इतने बड़े पुरोहित हैं तो हम अपने पुत्रों को बदल लेते हैं, तुम मेरे लल्ला को लेकर जाओ और मैं तुम्हारे पुत्र को लेकर आती हूं। देखते हैं कि कुलपुरोहित यह जान पाते हैं या नहीं.. इस तरह माताएं गर्ग ऋषि की परीक्षा लेने लगीं।
जब गर्गाचार्य ने दोनों बालको को पहचान कर किया उनका नामकरण
दोनों माताएं बालकों को लेकर गर्गाचार्य के समक्ष गई। लेकिन गर्गचार्य ने जैसे ही यशोदा के हाथ में बालक को देखा तो वे पहचान गए और कहने लगे कि यह रोहिणी पुत्र है। इस कारण बालक का नाम रौहणेय होगा, यह बालक अपने गुणों से सबको आनंदित करेगा तो एक नाम राम होगा और यह बहुत बलशाली होगा इसके बल समान कोई दूसरा न होगा, जिसके कारण इसका एक नाम बल भी होगा, इस तरह से इसका सबसे ज्यादा लिया जाने वाला नाम बलराम रहेगा। किसी में कोई भेद न करने के कारण यह सभी को अपनी ओर आकर्षित करेगा इसलिए इसका एक नाम संकर्षण होगा।
जब कृष्ण जी को देखकर ऋषिगर्ग ने खो दी अपनी सुध
जब ऋषि गर्ग मे रोहिणी की गोद के बालक को देखा तो वे बालक कि मनमोहक छवि को देखकर उसमें ही खो गए और अपमी सुध-वुध भूलगए। गर्ग ऋषि जैसे मानो एक जगह जड़ हो गए वे न कुछ कहते ने उनके शरीर में कोई हलचल होती वे तो बस एकटक लगाएं बालक को निहारने लगे। तब घबराकर यशोदा और नंदबाबा ने पूछा कि कि आचार्य क्या हुआ। तब कही जाकर गर्गाचार्य को अपनी सुधी हुई।