नवरात्रि 2018 : सिद्धि पाने के लिए किस काल में और कैसे करें साधना
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नवरात्रि साधना के लिए सर्वोत्तम है। इन दिनों की गयी साधना से किसी भी क्षेत्र में इच्छित सफलता प्राप्त की जा सकती है। खिलाड़ी मैदान में खेल को साधता है, तो विद्यार्थी विद्याध्ययन को साधता है। इसी तरह अध्यात्म क्षेत्र में ऊंचे उठने के लिए निष्काम साधना के माध्यम से साधक ऊंचा उठता है। साधना से उसका आलोक अन्तराल में प्रवेश करता है तो पुण्य-परमार्थ की प्रवृत्तियां उभरती हैं। पुण्य अर्थात् आत्मसंयम, परमार्थ अर्थात् सत्प्रवृत्ति संवर्धन में उत्साह। इन्हीं के समन्वय को देवत्व कहते हैं। आश्विन नवरात्र इस दिशा में उच्च स्तर को प्राप्त करने का सुनहरा अवसर है। मनोयोगपूर्वक की गयी साधना कभी निष्फल नहीं होती। यह सत्य है कि इन दिनों साधारण पुरुषार्थ करने पर उसकी असाधारण उपलब्धि हासिल होती है।
नवरात्र साधना से लाभ
जिस अनुपात में साधना के मर्म अंतस की गहराई में उतरती है, उसी अनुपात में वैयक्तिक प्रखरता और सामूहिक समर्थता की अभिवृद्धि होती है। सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। चेतना में उत्कृष्टता का स्तर बढ़ने लगता है। साधना से ही अध्यात्म तत्वज्ञान और साधना विधान की व्यावहारिक गरिमा प्रकट होती है। यह प्रतिफल ऐसे हैं जिन्हें अपनाए जाने पर मनुष्य में देवत्व का उदय होना सुनिश्चित है। जहां सज्जनता बढ़ेगी वहां अपनी इसी धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण चहुँओर दिखाई देगा।
साधना का स्वरूप
साधना काल में शरीर के साथ कपड़े (ढीले-ढाले) का भी पवित्रता पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। साधना करते समय सुखासन में तथा स्वच्छ आसन में बैठना चाहिए। कोलाहल से दूर मंदिर या शांत वातावरण में साधना करनी चाहिए। ताकि मन में कोई व्यवधान न आये।
साधना का समय
प्रातः ब्रह्ममूहुर्त में उठकर साधना करना सर्वोत्तम माना गया है। इसके अतिरिक्त सूर्योदय व सूर्यास्त के एक घंटा पूर्व तथा एक घंटा बाद तक का समय साधनाकाल के उपयुक्त कहा गया है।
नवरात्र साधना काल में भोजन
नवरात्रि साधना काल में भोजन का भी उतना ही महत्त्व है जितना की साधना का। भोजन पौष्टिक व सुपाच्य हो, तो पेट के साथ मन भी स्वस्थ रहता है। वर्तमान परिस्थितियों में अमृताशन पर निर्वाह किया जाय। अमृताशन अर्थात् उबला अन्न। दाल चावल, दलिया, मौसमी फल आदि। दालों में मूंग की दाल अधिक उपयुक्त पड़ती है। अमृताशन में अन्न के साथ-साथ पालक आदि साग भी डाले जा सकते हैं। एक बार जो निर्णय हो साधना की पूरी अवधि तक उसी पर चलना चाहिए। साधना काल में मिर्च, लौंग, हींग जैसे उत्तेजक गरम मसालों का निषेध रखना चाहिए।
लेखक - अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।