Holi 2018: अभयदान का भी पर्व है होली, जानिए होली मनाने की पीछे की कथा

स्वामी शरणानंद गिरि Updated Fri, 02 Mar 2018 08:09 AM IST
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हेमंत की ठिठुरन, वसंत के साथ ही पुलक में बदलने लगती है इस बीच में एक पर्व महाशिवरात्रि भी आता है। महाशिवरात्रि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वसंत के अंत में जब ऋतु बदलती है, तो होली आती है। होली मूलतः एक यज्ञीय पर्व है। नई फसल के पकने पर 'नवअन्न यज्ञ' के जरिए अन्न को यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित कर उसे समाज को समर्पित करने का भाव रहता है, इसीलिए होली को 'वासंती नव-सस्येष्टि' यज्ञ नाम भी दिया है।
मूल त्योहार फागुन की पूर्णिमा और उसके अगले दिन माना जाता है, लेकिन शुरुआत आठ दिन, पहले होलाष्टक से हो जाती है। होली से आठ दिन पहले दहन स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास व होली का डंडा स्थापित किया जाता है। 

जिस गांव गली मोहल्ले के चौराहे पर यह स्थापना होती है, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई शुभ कार्य नहीं होता। होलाष्टक मुख्य रूप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है। होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोलेनाथ ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म किया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी।

होली उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, महाराष्ट्र, उडीसा, गोवा आदि में अलग ढंग से मनाने का चलन है। जिन प्रदेशों में होलाष्टक से जुड़ी मान्यताओं को नहीं माना जाता है, उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बंद नहीं किए जाते।





 
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