प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी की तिथि पर भगवान भैरव की विशेष रूप से साधना आराधना की जाती है। तंत्र-मंत्र के साधकों के अनुसार भगवान भैरव को परम शक्तिशाली रुद्र बताया गया है। इन्हें देवाधिदेव भगवान शिव का अवतार माना गया है। इस माह काशी के कोतवाल कहे जाने वाले भगवान भैरव की पूजा की पावन तिथि यानी कालाष्टमी 26 अप्रैल को मनाई जाएगी। भगवान भैरव एक ऐसे देवता हैं जिनकी साधना करने वाले भक्त पर किसी भी प्रकार की उपरी बाधा, भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि का खतरा नहीं रहता है।
Kalashtami 2019 : 26 अप्रैल को मनाई जाएगी कालाष्टमी, जानें किस पूजा से प्रसन्न होंगे भैरव
ऐसे हुआ काल भैरव का प्राकट्य
कालभैरव के जन्म को लेकर पुराणों में एक बड़ी ही रोचक कथा है। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में कौन सर्वश्रेष्ठ है इस बात को लेकर वाद-विवाद पैदा हो गया। तब दोनों ने अपने आपको श्रेष्ठ बताया और आपस में एक दूसरे से युद्ध करने लगे। इसके बाद सभी देवताओं ने वेद से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है भगवान शिव ही सर्वश्रेष्ठ हैं।
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जब ब्रह्माजी ने शिवजी को कहे अपशब्द
वेद के द्वारा भगवान शिव की महिमा ब्रह्माजी को पसंद नहीं आई और उन्होंने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद अत्यंत दु:खी हुए। उसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रूद्र रखा है इसलिए तुम मेरी सेवा में आ जाओ।
ऐसे कटा ब्रह्माजी का पांचवा सिर
ब्रह्माजी के इस आचरण पर भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने उसी क्षण भैरव को प्रकट करते हुए कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को ही काट दिया।
इस तरह भैरव हुए ब्रह्म हत्या से मुक्त
इस पूरे प्रकरण के बाद भगवान शिव के कहने पर भैरव जी काशी को कर गए, जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्ति किया। आज भी वाराणसी में भगवान भैरव काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। जिनका दर्शन किये बगैर बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।