Hanuman Jayanti 2022 : तमिल कैलेंडर में हनुमान जयंती आज, जानिए अलग-अलग जगहों पर हनुमान जयंती की मान्यताएं
तमिल कैलेंडर के अनुसार हनुमान जयंती अमावस्या तिथि पर 02 जनवरी 2022 को मनाई जा रही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
Tamil Hanuman Jayanti 2022 : देश के अलग-अलग स्थानों और क्षेत्रों में हनुमान जयंती अलग-अलग दिन मनाने की परंपरा है। तमिल कैलेंडर के अनुसार भगवान हनुमान का जन्म अमावस्या तिथि पर यानी आज 02 जनवरी 2022 को मनाई जा रही है। तमिलनाडू में हनुमान जयंती को हनुमथ जयन्थी के रूप में मनाए जाने की मान्यताएं हैं। तमिलनाडू में हनुमथ जयन्थी मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि पर मनाई जाती है। तमिल मान्यताओं के अनुसार भगवान हनुमान का जन्म मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि पर मूल नक्षत्र में हुआ था। ज्यादातर मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि और मूल नक्षत्र दोनों एक ही दिन पड़ते हैं, लेकिन जिन वर्षो में ये दोनों एक साथ नहीं आते हैं तो पौष अमावस्या तिथि पर तमिलनाडू में हनुमान जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार 02 जनवरी 2022 को अमावस्या तिथि पर तमिलनाडू में हनुमान जयंती का त्योहार मनाया जा रहा है।
हनुमान जयंती तिथि को लेकर मान्यताएं
उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाई जाती है। मान्यता है कि राम भक्त और अंजनी पुत्र का जन्म चैत्र माह की पूर्णिम तिथि को हुआ था जिसके अवसर पर उत्तर भारत के कई राज्यों में हनुमान जयंती को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। वहीं आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हनुमान जयंती का पर्व कई दिनों तक मनाने की परंपरा होती है। यहां पर हनुमान जयंती 41 दिनों तक मनाई जाती है। जिसमें चैत्र पूर्णिमा से शुरूआत होती है और वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष के दसवें दिन पर समाप्त होती है। वहीं कर्नाटक में हनुमान जयंती मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भी मनाई जाती है। यहां पर इस दिन को हनुमान व्रतम के नाम से जाना जाता है।
अमावस्या तिथि
02 जनवरी 2022 को अमावस्या तिथि सुबह 03 बजकर 41 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 03 जनवरी की सुबह 12 बजकर 02 मिनट तक रहेगी।
हनुमान चालीसा Hanuman Chalisa
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निजमनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन वरन विराज सुवेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।
शंकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन।।
विद्यावान गुणी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना।।
जुग सहस्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को भावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।