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Devshayani Ekadashi 2025: देवशयनी एकादशी पर करें इस चालीसा का पाठ, दूर होंगी परेशानियां मिलेगा धन लाभ

Sun, 06 Jul 2025 07:30 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Sun, 06 Jul 2025 07:30 AM IST
सार

Devshayani Ekadashi 2025: इस साल 6 जुलाई को देवशयनी एकादशी है। इस दिन विशाखा नक्षत्र और साध्य योग का संयोग बना हुआ है। 

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Devshayani Ekadashi 2025 shubh yog and upay know Laxmi Chalisa
Devshayani Ekadashi 2025 - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

Devshayani Ekadashi 2025: एकादशी तिथि सृष्टि के संचालक श्री विष्णु जी की उपासना के लिए बेहद शुभ है। इस दिन की गई पूजा-अर्चना, दान-दक्षिणा व भजन-कीर्तन का फल साधक को अवश्य मिलता है। यही नहीं देवी लक्ष्मी की कृपा भी जीवन पर बनी रहती हैं। आमतौर पर सभी विष्णु भक्त साल की 24 एकादशियों पर प्रभु की आराधना करते हैं। परंतु देवशयनी सभी में खास है, क्योंकि इस दिन से श्रीहरि देवी लक्ष्मी के साथ चार मास की योग निद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान देवी-देवता भी प्रभु के साथ योग निद्रा में होते हैं। इसलिए इस चार महीने की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है जिसमें शादी-विवाह, तिलक, हवन और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य करना वर्जित होता है।

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इस साल 6 जुलाई को देवशयनी एकादशी है। इस दिन विशाखा नक्षत्र और साध्य योग का संयोग बना हुआ है। इस योग में विष्णु जी की उपासना के साथ-साथ लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना और भी कल्याणकारी हो सकता है। इसके प्रभाव से कर्ज से मुक्ति, व्यापार में लाभ और आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। आइए इसके बारे में जानते हैं।

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दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥

॥ सोरठा॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही॥

श्री लक्ष्मी चालीसा 
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥1

तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥2॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥3॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥4॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥5॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥6॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥7॥

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥8॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥9॥

ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥10॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥11॥

पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥12॥

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥13॥

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥14॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥15॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥16॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥17॥

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥18॥

रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥19॥

दोहा
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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