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Dev Uthani Ekadashi 2024: विष्णु चालीसा से दूर होंगे सारे दुख, देवउनठनी एकादशी पर जरूर करें इसका पाठ

Mon, 11 Nov 2024 05:23 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Mon, 11 Nov 2024 05:23 PM IST
सार

Vishnu Chalisa: साल में 24 एकादशी का व्रत रखा जाता है, जो सभी भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन उनकी पूजा अर्चना करने से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण मिलता है। साथ ही साधक की आध्यात्मिक प्रगति होती है।

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Dev Uthani Ekadashi 2024 puja vidhi know Vishnu Chalisa benefits in hindi
Dev Uthani Ekadashi 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Dev Uthani Ekadashi 2024: साल में 24 एकादशी का व्रत रखा जाता है, जो सभी भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन उनकी पूजा अर्चना करने से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण मिलता है। साथ ही साधक की आध्यात्मिक प्रगति होती है। मान्यता है कि एकादशी तिथि पर व्रत रखने से सभी पापों का नाश और पुण्य फलों की प्राप्ति होती हैं। हालांकि इन सभी में कार्तिक माह में आने वाली देवउठनी एकादशी को सबसे खास और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लंबे योग निद्रा से जागते हैं, और फिर से सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं। इसे देवोत्थान के नाम से भी जाना जाता है।

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पंचांग के अनुसार इस वर्ष 12 नवंबर 2024 को देवोत्थान यानी देवउठनी एकादशी है। इस तिथि पर हर्षण योग का निर्माण हो रहा है, जो शाम 7 बजकर 09 मिनट तक रहेगा। इसके बाद वज्र योग की शुरुआत होगी। इस योग में विष्णु चालीसा का पाठ करने से साधक को आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती हैं। साथ ही घर में सुख, शांति, समृद्धि, और वैभव आता है। ऐसे में आइए इस चालीसा के बारे में जानते हैं।

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विष्णु चालीसा

दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

चौपाई 
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥
 

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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