अध्ययन में खुलासा: कुपोषण के मामलों का पंजीकरण जरूरी, नहीं जानते 55 फीसदी पंचायत प्रतिनिधि
प्रदेश में 49 फीसदी कम्युनिटी सदस्यों को भी इसका ज्ञान नहीं है। आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों का हर महीने वजन करने की बात 96.4 कमेटी सदस्यों और 84.1 फीसदी कमेटी सदस्यों ने ही कन्फर्म की, बाकी ने नहीं। पीजीआई चंडीगढ़ के सामुदायिक मेडिसिन विभाग के अध्ययन मेें यह खुलासा हुआ है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हिमाचल प्रदेश में कुपोषण के मामलों का पंजीकरण जरूरी है, इस बात को 55 फीसदी पंचायत प्रतिनिधि और ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समितियों के अन्य सदस्य नहीं जानते हैं। अन्य सदस्यों में शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा वर्कर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं। प्रदेश में 49 फीसदी कम्युनिटी सदस्यों को भी इसका ज्ञान नहीं है। आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों का हर महीने वजन करने की बात 96.4 कमेटी सदस्यों और 84.1 फीसदी कमेटी सदस्यों ने ही कन्फर्म की, बाकी ने नहीं। 10 फीसदी कम्युनिटी सदस्यों ने इसकी पुष्टि नहीं की कि छह साल से कम आयु के बच्चों, गर्भवती महिलाओं आदि के लिए घर राशन पहुंचाया जाता है। पीजीआई चंडीगढ़ के सामुदायिक मेडिसिन विभाग के अध्ययन मेें यह खुलासा हुआ है। यह संयुक्त अध्ययन इस विभाग के विशेषज्ञों आंचल धीमान, पूनम खन्ना और तरुणदीप सिंह ने किया है।
अध्ययन के अनुसार प्रदेश में 33 फीसदी कम्युनिटी सदस्य स्वच्छता और पोषण की अपनी जिम्मेवारी से अनजान हैं। इससे प्रदेश में संबंधित कार्यक्रमों को धरातल पर उतारने दिक्कत आ रही है। ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समितियों (वीएचएसएनसी) का गठन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत वर्ष 2007 से शुरू हो गया था। इसका मकसद स्थानीय स्वास्थ्य एवं स्वच्छता विषयों को ठीक से लागू करना रहा है। इस बारे में पीजीआई की इस टीम ने जिला कांगड़ा की 30 कमेटियों पर यह अध्ययन किया। इसके लिए कांगड़ा जिले के 13 स्वास्थ्य ब्लॉकों के तीन ब्लॉकों और दस गांवों को नमूने के तौर पर अध्ययन के लिए चुना। अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार समितियों से जुडे़ कम्युनिटी सदस्यों मेें इन विषयों पर जागरूकता की कमी पाई गई। यह जागरूकता महज 67 फीसदी सदस्यों में रही।
कहीं युवा मंडल सदस्य नहीं मिले तो कहीं महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता
प्रत्येक कमेटी के कम से कम 15 सदस्य होने चाहिए। ज्यादातर गांवों में युवा मंडल के गठन न होने के कारण इनसे सदस्यों की गैर हाजिरी रही। तीन उपकेंद्रों में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता नहीं थीं। इनमें पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही सदस्य रहे। सभी 30 कमेटियों में 5 फीसदी से ज्यादा महिला सदस्य थे। औसत रूप से 67 महिलाएं और 33 पुरुष इसके सदस्य थे।
16 फीसदी उपप्रधान, शिक्षक और महिला पंच बैठकों में भाग नहीं लेते
सभी सदस्यों को इसकी जागरू कता तो थी कि वे इस कमेटी के सदस्य हैं, मगर छह फीसदी एनचएम के बारे में नहीं जानते थे। नौ फीसदी कमेटी की गाइडलाइंस और अपनी भूमिका तथा जिम्मेवारी की जानकारी नहीं रखते थे। कमेटी की गतिविधियों का हिस्सा केवल 50 सदस्य ही रहे हैं। 16 फीसदी ऐसे लोग जो इन बैठकों में भाग नहीं लेते थे, उनमें उप प्रधान, शिक्षक और महिला पंच हैं।