Himachal Congress: राठौर के विधानसभा क्षेत्र ठियोग में टिकट के लिए कांग्रेस की बढे़गी लड़ाई
इंदु वर्मा एलान कर चुकी हैं कि वह ठियोग से चुनाव लड़ना चाह रही हैं, हालांकि कांग्रेस हाईकमान का जो भी आदेश होगा, वह उन्हें मान्य होगा।
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भाजपा नेत्री इंदु वर्मा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद ठियोग की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर के विधानसभा हलके ठियोग में अब टिकट के लिए कांग्रेस की लड़ाई बढ़ जाएगी। इंदु वर्मा एलान कर चुकी हैं कि वह ठियोग से चुनाव लड़ना चाह रही हैं, हालांकि कांग्रेस हाईकमान का जो भी आदेश होगा, वह उन्हें मान्य होगा। उनके इस बयान से एक बात साफ है कि इंदु वर्मा ने यूं ही भाजपा छोड़कर कांग्रेस ज्वाइन नहीं की है। कहीं न कहीं उनकी टिकट की महत्वाकांक्षा भी साथ है।
जहां तक ठियोग से कांग्रेस के टिकट की बात है तो कहा जा रहा है कि कुलदीप सिंह राठौर को पार्टी प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटाया गया तो बताया गया है कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें ठियोग से चुनाव लड़वाना चाह रहा है। हालांकि ठियोग से दीपक राठौर भी कांग्रेस से टिकट के दूसरे प्रबल दावेदार रहे हैं, जिनको पिछली बार वीरभद्र सरकार की तत्कालीन वरिष्ठ मंत्री विद्या स्टोक्स का टिकट काटकर प्रत्याशी बनाया गया था।
उधर, पूर्व में दो बार इंदु वर्मा के पति दिवंगत पूर्व विधायक राकेश वर्मा के खिलाफ दो बार प्रत्याशी रह चुके राजेंद्र वर्मा भी यहां से टिकट के तीसरे दावेदार होंगे। सूत्रों की मानें तो कुलदीप सिंह राठौर और राजेंद्र वर्मा का तो अंदरखाते यह समझौता भी हो चुका है कि इनमें से जिसको भी टिकट मिलेगा, वह दूसरे का साथ देगा। उधर, कुमारसैन से दिवंगत पूर्व मंत्री जय बिहारी लाल खाची के बेटे विजय पाल खाची भी कांग्रेस की राजनीति में नेपथ्य में चले गए हैं। उनसे भाजपा के नेता भी संपर्क में बताए जाते हैं, पर उन्होंने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
वहीं वीरभद्र खेमे के करीबी माने जाने वाले एक अन्य नेता एनएसयूआई के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अतुल शर्मा भी टिकट के दावेदार हैं। इस तरह से ठियोग में इंदु वर्मा की कांग्रेस में इस तरह से हुई एंट्री से कांग्रेस के सभी खेमों में खलबली मच गई है। कांग्रेस के सभी खेमों में तालमेल बनाना अब बड़ी चुनौती होगी।
राकेश वर्मा का रहा है इस क्षेत्र में खासा रसूख
वर्ष 1993 में पहली बार ठियोग से भाजपा विधायक बने राकेश वर्मा का इस क्षेत्र में अपना खासा रसूख रहा है। वह दो बार निर्दलीय विधायक भी रहे। यानी एक वक्त ऐसा था, उन्हें टिकट मिले या न मिले, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने पर यहां भाजपा की तो जमानत तक जब्त हो चुकी है।
वर्ष 2012 में जब विधानसभा हलकों का पुनर्सीमांकन हुआ तो राकेश वर्मा के प्रभाव वाला बलसन का क्षेत्र कटकर चौपाल में चला गया। इसके बाद उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत आई। वह 2012 और 2017 के दोनों चुनाव हार गए। कुछ क्षेत्र कसुम्पटी में चला गया। ऐसे में वर्मा परिवार का प्रभाव इन तीनों हलकों में है।