Dev Astha: देव परंपरा निभाने के लिए सात समंदर पार से भी गांव खींच लाई आस्था
सांबर गांव के युवा ओमपाल शर्मा को चेक रिपब्लिक के प्राग से करीब 5500 किलोमीटर का सफर पूरा करवाकर शिमला पहुंचाया।
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देवभूमि हिमाचल के लोगों की देवी-देवताओं में आस्था सात समंदर पार भी कम नहीं होती। यहां पहाड़ों में कहा जाता है कि कुलदेवी ‘शांघी’ होती है, यानी वह शांघा (कंठ) में होती है। देश विदेश में भी साथ रहती है और अपने भक्त की रक्षा करती है। इसी आस्था ने सांबर गांव के युवा ओमपाल शर्मा को चेक रिपब्लिक के प्राग से करीब 5500 किलोमीटर का सफर पूरा करवाकर शिमला पहुंचाया। कोविडकाल के बाद अब स्थिति सामान्य होने पर ठियोग और कोटखाई की सीमा पर सांबर तथा ब्यौण गांव के बीच जुब्बड़ी (दूब उगे मैदान) में यहां के निवासियों की कुलदेवी माता कामाक्षा का महायज्ञ रेहली मेला हुआ।
इसमें देश के कोने-कोने में बसे देवी के भक्त पहुंचे। ओमपाल शर्मा पुत्र सिरीराम शर्मा जिला शिमला की ठियोग तहसील के गांव सांबर के रहने वाले हैं। इनके ताया गंगाराम शर्मा देवी कामाक्षा के भंडारी हैं। ओमपाल ने हाल ही में देवी के भंडार के लिए विदेशों से की कमाई से एक लाख रुपये भेंट किए। वह चेक रिपब्लिक के प्राग में आईटी कंपनी आईबीएम में काम करते हैं। वह चार दिन पहले ही देवी कामाक्षा के इस उत्सव में शामिल होने के लिए पहुंचे। इन्हें फ्लाइट से पहुंचने में करीब 13 घंटे लग गए। वह चार साल से वहीं कार्यरत हैं।
सदियों से निभाई जा रही परंपरा
देवी कामाक्षा के इस मेले को हर तीन साल बाद आयोजित किया जाता है। इसमें हर परिवार के लोगों को शामिल होना जरूरी होता है। इसके लिए इस क्षेत्र के लोगों के पुरखों ने संकल्प ले रखे हैं कि उनकी संतानें भी इसमें शामिल होती रहेंगी। देवी कामाक्षा के भक्त यहां के लिए सदियों पहले करसोग के काओ से आए थे और अपने साथ देवी की पिंडी को भी लाए थे। करसोग में देवी कामाक्षा का संबंध देवी सती से संबंधित 51 में से एक गुवाहाटी स्थित कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी से है।
देवधुनों पर हुआ डोमेश्वर का नृत्य
देवी का यह उत्सव 9 सितंबर से शुरू हो गया और 11 सितंबर तक चला। इसमें पहले देवी के मंदिर कलाकर से नेजे लाए जाते हैं। इन्हें मेला मैदान से ऊपर चबूतरे पर फहराया जाता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देवता डोमेश्वर के कारिंदों ने देवधुनों पर चोल्टू नृत्य किया। इसके अलावा शिला घूंड के पाशी खूंद यानी पांडवपक्षी दल और शाठी खूंद यानी कौरवपक्षी दलों के बीच धनुष-बाण का खेल ठोडा हुआ। इसे भी देवताओं से जुड़ा खेल माना जाता है। इसमें खिलाड़ी एक-दूसरे की टांगों पर तीर दागते हैं। इसके अलावा रंगारंग सांस्कृतिक नृत्य भी हुआ।