Himachal: पार्किंसन रोगियों के लिए विकसित तकनीक के शोध पर पेटेंट, अंकिता रघुवंशी ने हासिल की उपलब्धि
ए सिस्टम फॉर प्रीडेक्टिंग फ्रीजिंग ऑफ गेट इन यूजर शीर्षक से विकसित इस तकनीक को भारतीय पेटेंट कार्यालय की ओर से पेटेंट प्रदान किया गया है।
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पालमपुर की शोधकर्ता अंकिता रघुवंशी ने अपनी पीएचडी शोध के दौरान विकसित एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य तकनीक पर पेटेंट प्राप्त कर क्षेत्र और प्रदेश का नाम रोशन किया है। यह शोध उन्होंने आईआईटी गांधीनगर में किया। ए सिस्टम फॉर प्रीडेक्टिंग फ्रीजिंग ऑफ गेट इन यूजर शीर्षक से विकसित इस तकनीक को भारतीय पेटेंट कार्यालय की ओर से पेटेंट प्रदान किया गया है। यह पेटेंट (संख्या 580118, आवेदन संख्या 202321087668) 21 दिसंबर 2023 को दायर किया गया था, जिसे 6 फरवरी 2026 को स्वीकृति मिली। पेटेंट आईआईटी गांधीनगर को प्रदान किया गया है, जिसमें आविष्कारकों के रूप में उत्तमा लाहिड़ी, प्रिया पल्लवी और अंकिता रघुवंशी शामिल हैं। यह शोध पार्किंसन रोग से जुड़े एक महत्वपूर्ण लक्षण फ्रीजिंग ऑफ गेट पर आधारित है। इस स्थिति में रोगियों को चलते समय अचानक अपने पैरों को आगे बढ़ाने में कठिनाई होती है, जिससे गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है। शोध के दौरान आठ पार्किंसन रोगियों और आठ स्वस्थ व्यक्तियों पर अध्ययन किया गया, ताकि उनके चलने के तरीके में अंतर का विश्लेषण किया जा सके।
अध्ययन का उद्देश्य उन प्रारंभिक संकेतों की पहचान करना था, जो फ्रीजिंग एपिसोड शुरू होने से पहले दिखाई देते हैं। इस तकनीक में पहनने योग्य गेट मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग किया गया है, जिसमें सेंसर आधारित स्मार्ट जूते और पैरों में लगाए जाने वाले मोशन मापने वाले उपकरण शामिल हैं। ये सेंसर लगातार चलने से जुड़ा डेटा जैसे गति, ताल और मूवमेंट पैटर्न रिकॉर्ड करते हैं। संग्रहित डाटा के आधार पर यह प्रणाली रोगी के चलने के व्यवहार का विश्लेषण करती है और फ्रीजिंग ऑफ गेट से जुड़े पैटर्न की पहचान करती है। इससे फ्रीजिंग एपिसोड का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, जिससे डॉक्टर और देखभाल करने वाले समय रहते जरूरी कदम उठा सकते हैं। यह शोध पार्किंसन रोग से जुड़े एक महत्वपूर्ण लक्षण फ्रीजिंग ऑफ गेट पर आधारित है। इस स्थिति में रोगियों को चलते समय अचानक अपने पैरों को आगे बढ़ाने में कठिनाई होती है, जिससे गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है। शोध के दौरान आठ पार्किंसन रोगियों और आठ स्वस्थ व्यक्तियों पर अध्ययन किया गया, ताकि उनके चलने के तरीके में अंतर का विश्लेषण किया जा सके।