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बंदरों को भारी पड़ सकती अपनी करतूत
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 29 Nov 2013 10:48 AM IST
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हिमाचल प्रदेश ने केंद्र सरकार से बंदरों की कैटेगरी बदलने की मांग की है। प्रदेश में बंदरों द्वारा किए जा रहे नुकसान का हवाला देते हुए केंद्र को इससे संबंधित प्रस्ताव भेजा गया है।
प्रस्ताव में बंदरों को फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों की श्रेणी में रखने का आग्रह किया गया है। यदि ऐसा होता है तो बंदरों को मारने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं रहेगी।
वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट-1972 के तहत बंदरों को शेड्यूल-2 की प्रजातियों में रखा गया है। यही कारण हैै कि उन्हें मारने के लिए वाइल्ड लाइफ वार्डन की अनुमति लेनी पड़ती है। वन विभाग की ओर से पर्यावरण मंत्रालय को भेजे गए प्रस्ताव में बंदरों को शेड्यूल-2 की कैटेगरी से हटा कर शेड्यूल-5 में रखने की मांग की गई है।
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शेड्यूल-5 में जिन पशुओं और पक्षियों को रखा गया है, उन्हें मारने के लिए किसी तरह की मंजूरी नहीं लेनी होती। वर्ष-2011 में वन विभाग ने एक्ट के तहत बंदरों को मारने की अनुमति दे दी थी, लेकिन मामला कोर्ट में पहुंचने के कारण इस पर फिलहाल रोक लगी हुई है।
विभाग ने यह प्रस्ताव किसानों और बागवानों को बंदरों द्वारा किए जाने वाले नुकसान से बचाने के लिए भेजा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में प्रदेश में साढ़े तीन लाख से अधिक बंदर हैं, जबकि गैर सरकारी संगठनों का मानना है कि इनकी संख्या पांच लाख से अधिक है।
बंदरों के निर्यात पर लगी रोक हटे
मोरारजी देसाई सरकार ने वर्ष-1978 में बंदरों के निर्यात पर रोक लगा दी थी। भारत से मेडिकल रिसर्च के लिए अमेरिका और यूरोप के देशों में बंदर निर्यात किए जाते थे।
विभाग ने बंदरों के निर्यात पर लगी इस रोक को हटाने संबंधी मांग को भी अपने प्रस्ताव में शामिल किया है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अन्य राज्य भी यदि इस मांग को उठाते हैं, तो केंद्र सरकार प्रस्ताव की मंजूरी पर शीघ्र विचार कर सकती है।
हर साल 500 करोड़ की क्षति
हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह तंवर बताते हैं कि हर साल प्रदेश में जंगली जानवर 500 करोड़ रुपये से अधिक की फसलें तबाह करते हैं। किसान सभा ने प्रदेश की 3243 पंचायतों का सर्वे किया था। इनमें से 2310 पंचायतों के किसान और बागवान जंगली जानवरों द्वारा पैदा की जाने वाली समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
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प्रस्ताव में बंदरों को फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों की श्रेणी में रखने का आग्रह किया गया है। यदि ऐसा होता है तो बंदरों को मारने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं रहेगी।
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वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट-1972 के तहत बंदरों को शेड्यूल-2 की प्रजातियों में रखा गया है। यही कारण हैै कि उन्हें मारने के लिए वाइल्ड लाइफ वार्डन की अनुमति लेनी पड़ती है। वन विभाग की ओर से पर्यावरण मंत्रालय को भेजे गए प्रस्ताव में बंदरों को शेड्यूल-2 की कैटेगरी से हटा कर शेड्यूल-5 में रखने की मांग की गई है।
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शेड्यूल-5 में जिन पशुओं और पक्षियों को रखा गया है, उन्हें मारने के लिए किसी तरह की मंजूरी नहीं लेनी होती। वर्ष-2011 में वन विभाग ने एक्ट के तहत बंदरों को मारने की अनुमति दे दी थी, लेकिन मामला कोर्ट में पहुंचने के कारण इस पर फिलहाल रोक लगी हुई है।
विभाग ने यह प्रस्ताव किसानों और बागवानों को बंदरों द्वारा किए जाने वाले नुकसान से बचाने के लिए भेजा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में प्रदेश में साढ़े तीन लाख से अधिक बंदर हैं, जबकि गैर सरकारी संगठनों का मानना है कि इनकी संख्या पांच लाख से अधिक है।
बंदरों के निर्यात पर लगी रोक हटे
मोरारजी देसाई सरकार ने वर्ष-1978 में बंदरों के निर्यात पर रोक लगा दी थी। भारत से मेडिकल रिसर्च के लिए अमेरिका और यूरोप के देशों में बंदर निर्यात किए जाते थे।
विभाग ने बंदरों के निर्यात पर लगी इस रोक को हटाने संबंधी मांग को भी अपने प्रस्ताव में शामिल किया है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अन्य राज्य भी यदि इस मांग को उठाते हैं, तो केंद्र सरकार प्रस्ताव की मंजूरी पर शीघ्र विचार कर सकती है।
हर साल 500 करोड़ की क्षति
हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह तंवर बताते हैं कि हर साल प्रदेश में जंगली जानवर 500 करोड़ रुपये से अधिक की फसलें तबाह करते हैं। किसान सभा ने प्रदेश की 3243 पंचायतों का सर्वे किया था। इनमें से 2310 पंचायतों के किसान और बागवान जंगली जानवरों द्वारा पैदा की जाने वाली समस्याओं का सामना कर रहे हैं।