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राजस्थान: उपचुनावों में गहलोत के मास्टर स्ट्रोक से चित हुए 'दुश्मन', खुद की मुसीबत टाल कर आलाकमान को दिया संदेश

Tue, 02 Nov 2021 07:23 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Tue, 02 Nov 2021 07:23 PM IST
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सार
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पार्टी हाईकमान के तमाम दबावों को दरकिनार कर दो सीटों के उपचुनाव तक मंत्रिमंडल फेरबदल, सरकार और संगठन में नियुक्तियों पर ब्रेक लगा रखा था। गहलोत जानते थे कि अगर दोनों सीटें कांग्रेस जीत जाती है तो सरकार में सचिन पायलट और उनके समर्थकों को भागीदारी देने का पार्टी हाईकमान का दबाव कम हो जाएगा...
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winning in by-elections of Rajasthan proved that CM Ashok Gehlot government has no oppose in public
सीएम अशोक गहलोत - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

राजस्थान के उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर सूबे की सियासत में सीएम अशोक गहलोत का झंडा बुलंद कर दिया है। वल्लभनगर और धरियावद विधानसभा सीटें जीतकर राजस्थान कांग्रेस में चल रही वर्चस्व की जंग में गहलोत एक बार फिर पायलट से  आगे निकल गए हैं। उपचुनावों के नतीजों ने तय कर दिया है कि अगले मंत्रिमंडल फेरबदल में गहलोत गुट का दबदबा कायम रहने की उम्मीद है। वहीं संगठन की कमान भी गहलोत के करीबी गोविंद सिंह डोटासरा के पास ही रहने का दबाव ज्यादा मजबूत हुआ है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सीएम अशोक गहलोत के मास्टर स्ट्रोक से भाजपा के साथ सचिन पायलट भी चित हो गए हैं। पंचायत चुनाव और उपचुनावों में जबरदस्त जीत हासिल कर उन्होंने पार्टी आलाकमान को भी अपनी ताकत का अहसास करवा दिया है। राज्य में अब सचिन पायलट की आगे क्या भूमिका होगी इस पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

गहलोत के मास्टर स्ट्रोक से भाजपा की हार

प्रदेश के उपचुनाव के परिणामों पर अमर उजाला से चर्चा करते हुए राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार संदीप दहिया ने कहा कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार को आगामी दिसंबर माह में तीन वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। एक तरह से ये उपचुनाव गहलोत सरकार का टेस्ट था, जिसमें वे अच्छे अंकों से पास हुए हैं। तीन साल के बाद भी जनता के बीच में सत्ता विरोधी लहर वाला फैक्टर नजर नहीं आ रहा है। दोनों सीटों पर लोगों ने सरकार के कोरोनाकाल के दौरान किए गए कामों और योजनाओं को सराहा और कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है।



दहिया ने आगे बताया कि भाजपा विधायक गौतम लाल मीणा के निधन से खाली हुई धरियावद विधानसभा सीट कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न थी। गौतमलाल मीणा के बेटे कन्हैयालाल मीणा का टिकट तय माना जा रहा था लेकिन पार्टी ने परिवारवाद पर लगाम के लिए कन्हैयालाल मीणा की जगह खेत सिंह मीणा को टिकट दिया, जिसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा। जबकि इस सीट पर भारतीय ट्राइबल पार्टी के बागी प्रत्याशी थावरचंद ने निर्दलीय चुनाव लड़कर भाजपा का खेल बिगाड़ दिया।  

इस सीट पर गहलोत के मास्टर स्ट्रोक ने भी जोरदार काम किया। चुनाव प्रचार थमने के एक दिन पहले गहलोत धरियावद पहुंचे। चुनावी सभाओं को संबोधित करने से पहले वे भाजपा के दिवंगत विधायक गौमत लाल मीणा के निवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने पहुंच गए। गहलोत ने मीणा के पुत्र कन्हैया लाल मीणा और अन्य परिजनों से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी। इस पर भाजपा ने सीएम पर जमकर हमला बोलते हुए इसे चुनावी हथकंडा तक करार दिया था। उधर, गहलोत ने जवाबी हमला बोलते हुए कहा था कि निधन पर शोक व्यक्त करने जाना हमारे सदियों के संस्कार और परंपरा हैं, लेकिन इसमें भी भाजपा नेताओं को परेशानी हो रही है। भाजपा को गौतम लाल मीणा की इतनी ही चिंता थी तो उनके बेटे कन्हैयालाल को टिकट देना चाहिए था।

पहले के मुकाबले मजबूत हुआ गहलोत खेमा

वरिष्ठ पत्रकार संदीप दहिया ने आगे बताया कि वल्लभनगर सीट कांग्रेस के गजेंद्र सिंह शक्तावत के निधन से खाली हुई थी। इस सीट पर पार्टी ने उनकी पत्नी प्रीति शक्तावत को अपना उम्मीदवार बनाया। उम्मीद के मुताबिक जनता की सहानुभूति भी प्रीति को मिली और उन्होंने अच्छे अंतराल से जीत दर्ज की। इस सीट पर भाजपा का गणित बिगाड़ने काम भाजपा के बागी उम्मीदवार और भाजपा के पूर्व विधायक और जनता सेना प्रमुख रणधीर सिंह भिंडर ने किया। भिंडर चुनाव में निर्दलीय उतरे थे। दूसरा इस सीट पर भाजपा की बड़ी मुसीबत उनके के ही बागी नेता उदयलाल डांगी बने। टिकट नहीं मिलने पर डांगी नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी से चुनावी मैदान में उतर गए। जिसका सीधा नुकसान भाजपा को हुआ।


उन्होंने आगे बताया कि इन दोनों सीटों के परिणाम अगर कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध भी जाते तो भी सरकार के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन ये दोनों उपचुनाव सरकार की प्रतिष्ठा का सवाल बन गए थे। अगर एक भी सीट कांग्रेस हार जाती तो सीधे गहलोत सरकार के कामकाज पर सवाल उठने लगते। पंचायत चुनाव और उपचुनावों के परिणामों के बाद गहलोत खेमा पहले के मुकाबले और मजबूत हो गया है। भविष्य में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में भी गहलोत गुट अब पायलट से आगे ही रहेगा।

आलाकमान को दिया ये संदेश

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पार्टी हाईकमान के तमाम दबावों को दरकिनार कर दो सीटों के उपचुनाव तक मंत्रिमंडल फेरबदल, सरकार और संगठन में नियुक्तियों पर ब्रेक लगा रखा था। गहलोत जानते थे कि अगर दोनों सीटें कांग्रेस जीत जाती है तो सरकार में सचिन पायलट और उनके समर्थकों को भागीदारी देने का पार्टी हाईकमान का दबाव कम हो जाएगा। गहलोत ने ये उपचुनाव जीत कर पार्टी हाईकमान को साफ संदेश दिया कि उनकी सरकार की लोकप्रियता बरकरार है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उपचुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर फिलहाल नहीं है। हालांकि 2023 के चुनाव पर इन चुनाव नतीजों के प्रभाव के बारे में कहना बहुत जल्दबाजी होगी। लेकिन ये दोनों सीट जीतकर प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी जरूर मजबूत हो गई है। संगठन में डोटासरा को हटाकर पायलट को संगठन की कमान सौंपने की मांग अब पहले के मुकाबले कमजोर पड़ेगी। जीत का सेहरा डोटासरा के सिर बांधे इसलिए उपचुनाव की पूरी कमान टीम गहलोत ने शुरू से अपनी हाथों में ले रखी थी। पायलट की टीम को उन्होंने शुरू से ही किनारे कर रखा था। प्रत्याशियों के नामांकन पत्र दाखिल करते समय सीएम गहलोत और पायलट ने पार्टी को एकजुट दिखाने के लिए एक साथ चुनावी रैली को जरूर संबोधित किया था।

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