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सम्मान को तरस रहे हैं देहदानियों के शव
आभा शर्मा/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
Updated Sat, 02 Aug 2014 03:36 PM IST
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जयपुर में देहदान करने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन देहदानी को वह 'गरिमा और सम्मान' नहीं मिल रहा है जिसके वे हक़दार हैं। देहदान की ज़रूरत मेडिकल विद्यार्थियों को देह विज्ञान (एनाटमी) की पढ़ाई में मदद के लिए पड़ती है और राजस्थान के मेडिकल कॉलेजों में एनाटमी की पढ़ाई के लिए शवों की कमी बताई जाती है।
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आमतौर पर लावारिस लाशों को एनाटमी की शिक्षा के काम में लिया जाता है लेकिन देहदान के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते एसएमएस कॉलेज को हर माह कम से कम दो-तीन शव मिल रहे हैं। देहदानियों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन उनके शव व्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।
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सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज (एसएमएस) के एनाटमी विभाग की प्रमुख संगीता चौहान के अनुसार अमूमन 15 छात्रों के बैच पर एक शव उपलब्ध करवाया जा रहा है, लेकिन अन्य कॉलेजों में इसकी काफ़ी कमी है। कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉक्टर रामेश्वर शर्मा ने स्वयं देहदान का संकल्प लेकर इस ओर सबका ध्यान दिलाया था। सात वर्ष पूर्व उनका निधन होने पर उनकी देह दान की गई।
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प्रभात चौधरी के पिता विमल कुमार चौधरी की मृत्यु इसी महीने हुई है। वह कहते हैं, "अपने प्रियजन की देह का दान बड़ा ही भावुक और मुश्किल काम है"। उनके पिता ने देहदान का संकल्प पत्र भरा था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिजन काफ़ी दुविधा में रहे। कुछ की राय थी कि अंतिम संस्कार न होने से दिवंगत को मोक्ष नहीं मिलता और आत्मा भटकती रहती है लेकिन मृतक की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए सब अंततः सहमत हो गए।
मगर कॉलेज में देहदानी को जो 'गरिमा और सम्मान' मिलना चाहिए उसकी उन्हें कमी बहुत खली। जब वे लोग अपने पिता को अंतिम विदा देने के लिए मेडिकल कॉलेज पहुंचे तो वहां व्यवस्था की कमी ने उन्हें काफ़ी मायूस किया। अस्पताल की एम्बुलेंस की हालत तो खस्ता थी ही, पूर्व सूचना के बावजूद कोई अधिकारी वहां नहीं था।
असंवेदनशील व्यवहार
दधीचि (हिंदू मान्यताओं के अनुसार राक्षस वृत्तासुर की मौत के अपनी अस्थियां दान करने वाले ऋषि) जयंती पर देहदानियों का अभिनंदन करने सहित कई सामाजिक संगठन लोगों को देहदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। लेकिन प्रशासन का असंवेदनशील व्यवहार इस मुहिम को धक्का पहुंचा सकता है।
डॉक्टर रामेश्वर शर्मा के शव को चूहों द्वारा कुतरे जाने की ख़बर को लेकर भी अस्पताल प्रशासन की काफ़ी आलोचना हुई थी। पूर्व कांग्रेस सरकार ने एक देहदान स्मारक बनाने की घोषणा भी की थी, जिसमें देहदानियों के नाम उत्कीर्ण किए जाने थे। लेकिन सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया, पर यह काम अधूरा ही रहा।