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Kota News: 'शिक्षा में पर्सनलाइजेशन से आएगा बड़ा बदलाव,' जानें मोशन एजुकेशन के फाउंडर नितिन विजय का विजन
Fri, 15 Mar 2024 07:19 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोटा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोटा
Published by: अरविंद कुमार
Updated Fri, 15 Mar 2024 07:19 PM IST
सार
'ईश्वर ने हर बच्चे को अपनी कमियों और खासियतों के साथ बनाया है। हर बच्चा खास है और उसको पढ़ाने-सिखाने का तरीका भी अलग है। इसलिए बच्चे की लर्निंग भी उसी के मुताबिक पर्सनलाइज होनी चाहिए।'
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नितिन विजय
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जब एक बच्चा पढ़ता है तो उसके और उसके परिवार का ही नहीं उसके गांव, शहर, प्रदेश, देश और अंततोगत्वा मानवता का भी विकास होता है। इसलिए हम चाहते हैं कि शिक्षा हर घर तक पहुंचे और दुनिया तालीम की रोशनी से जगमगाए। इसके लिए तकनीक की मदद से हम पर्सनलाइज और टॉप क्वालिटी एजुकेशन इन मिनिमम प्राइज पॉइंट की दिशा में बढ़ रहे हैं। मोशन एजुकेशन के फाउंडर और सीईओ नितिन विजय ने अपना विजन शेयर किया।
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ईश्वर ने हर बच्चे को अपनी कमियों और खासियतों के साथ बनाया है। हर बच्चा खास है और उसको पढ़ाने-सिखाने का तरीका भी अलग है। इसलिए बच्चे की लर्निंग भी उसी के मुताबिक, पर्सनलाइज होनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो शिक्षा की दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव आएगा। आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि पढ़ने-पढ़ाने के पर्सनलाइज या व्यक्तिगत तरीके से मेरा मतलब क्या है। इसको इस उदाहरण से समझिए। जब कोई एथलीट या कहूं कि कोई लायक एथलीट किसी प्रोफेशनल अकेडमी में जाता है तो उससे क्या गोल अचीव करवाना है, उसके मुताबिक उसकी सफलता सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे पैरामीटर तय किए जाते हैं। इस पर काम किया जाता है कि उसका बॉडी वेट कैसा है, उसे कितनी एक्सरसाइज की जरूरत है, उसका मेंटल स्टेटस कैसा है। उसके लिए एक स्ट्रक्चर्ड डाइट प्लान बनाया जाता है और मेंटर एलॉट करते हैं। ताकि वह हमारे देश और खुद के गोल अचीव कर सके...यह पर्सनलाइजेशन है। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसा पर्सनलाइजेशन शिक्षा में भी होना चाहिए। पर क्या ऐसा है हो रहा है। जवाब है, कुछ हद तक है पर ज्यादातर को उपलब्ध नहीं है। पर सोचो कि यह सबको मुहैया होता तो हमारा देश और विश्व कितनी अच्छी जगह होता।
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महान रही है हमारी विरासत
सवाल यह है क्या यह हमारे पास था। हां, था। मैं आपको आज से सैंकड़ों, हजारों वर्ष पूर्व लेकर चलता हूं। तब देश में गुरुकुल परिपाटी थी। आपने सुना होगा-राजा-महाराजाओं तथा कुलीन वर्ग के बच्चे उन गुरुकुलों में पढ़ते थे। वहां वन-टू-वन इंटरक्शन होता था। गुरुकुल में जो गुरु होते थे, वह जानते थे कि उनके पास जो शिष्य आ रहा है वह किस परिवेश, संस्कार से है और वास्तविकता में उसमें क्या-क्या काबिलियत है। वे उसको उसी के अनुसार उनको शिक्षा-दीक्षा देते थे। महाभारत काल में द्रोणाचार्य ने पांडवों को जो सिखाया, उसके आधार पर युधिष्ठिर अपनी नैतिकता, भीम गदा, अर्जुन धनुर्विद्या, नकुल तलवारबाजी और सहदेव बुद्धिमत्ता के लिए जाने गए। कुल मिलकर इस कहानी से पता चलता है कि गुरुकुल में गुरु को अपने शिष्यों के बारे में किस हद तक व्यक्तिगत समझ होती थी। इसीलिए वह उनको उनके लिए जो भी श्रेष्ठ होता था, उसमें निष्णात करते थे।
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अब हम मुद्दे पर आते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में यह जो पर्सनलाइजेशन था, वह आज नहीं है। गुरुकुल में बच्चे कम होते थे, लोकतांत्रिक माहौल में आज सभी को शिक्षा का अधिकार है और शिक्षा का क्षेत्र व्यापक हुआ है। स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं खुद भी समाज के हर तबके को शिक्षा देने के पक्ष में हूं और चाहता हूं कि अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे को भी बेहतर से बेहतर शिक्षा मिले। मैं उन सब लोगों को नत मस्तक होकर प्रणाम करता हूं, जिन्होंने सबको शिक्षा का अधिकार दिलवाया।
बहरहाल, आज बच्चे कई गुना अधिक हैं। शिक्षा का प्रसार बढ़ा, लेकिन पर्सनलाइजेशन की कीमत पर। हम शिक्षा का विस्तार तो कर पाए, लेकिन हमने पर्सनलाइजेशन कहीं मिस कर दिया। हम जानते हैं कि सबको शिक्षा के लिए इसका अफोर्डेबल होना जरूरी था। लेकिन जो शिक्षा प्रणाली बनी उसमें पढ़ाने वाले शिक्षक उतने नहीं हैं। आज के समय में गुरु द्रोणाचार्य जैसे एजुकेटर हर बच्चे के लिए संभव नहीं है। इसलिए वह व्यक्तिगत टच नहीं रहा। शिक्षा में पर्सनलाइजेशन नहीं रहा। आज शिक्षा अफोर्डेबल तो हो गई है पर पर्सनलाइजेशन और क्वॉलिटी के मामले में पिछड़ रही है।
सवाल हैं पर जवाब भी हैं
जब भी किसी कोचिंग संस्थान, स्कूल या यूनिवर्सिटी में कुछ बच्चे आते हैं तो उनमें से टॉपर्स को पहचान लिया जाता है। उन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह इस विश्वास से प्रेरित होता है कि इससे उनका रिजल्ट अच्छा बनता है। लेकिन लेकिन सामान्य बच्चों का क्या होगा। जो बच्चे 10 से 12 घंटे मेहनत करके अपने सपनों तक पहुंचाना चाहते हैं, उन पर कौन ध्यान देगा। उसके लिए कौन काम करेगा।
आमतौर पर माना जाता है कि शिक्षा में गुणवत्ता चाहिए, हर बच्चे के अनुकूल पढ़ाई चाहिए तो उसकी लागत भी बढ़ेगी। अब आपके मन में यह सवाल भी आ रहा होगा कि शिक्षा के क्षेत्र में जिस पर्सनलाइजेशन की हम बात कर रहे हैं, क्या ऐसा किसी क्षेत्र में मास लेवल पर हो रहा है…जवाब है, हां। हेल्थ केयर के क्षेत्र में ऐसा हो रहा है। आपने देखा होगा, हर मरीज की बीमारी अलग-अलग होती है तो उनका इलाज भी अलग-अलग तरह से किया जाता है। हर बीमारी के लिए अलग दवा दी जाती है, अलग उपचार किया जाता है।
हम कह रहे हैं, वैसा ही शिक्षा के क्षेत्र में होना चाहिए। हर बच्चे की जरूर अलग होती है। सीखने की क्षमता अलग होती है। उसी के मुताबिक उसकी शिक्षा देने की जरूरत होती है। इसके विपरीत फ़िलहाल हो यह रहा है कि हम सभी बच्चों को एक ही तरह से पढ़ाते-सिखाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सभी का उपचार एक ही दवा से उपचार कर दिया जाता है। आप ही बताएं, कमजोर और टॉपर बच्चे को जब एक ही स्तर के सवाल हल करने पड़े तो क्या होगा। यही होगा न कि टॉपर आसानी से हल कर देगा, लेकिन कमजोर बच्चे के हौसले पस्त हो जाएंगे। अब आपका सवाल होगा, ठीक है, समस्या है। इसका हल क्या है।
तकनीक से बदलेगी तालीम दुनिया
इसका जवाब है टेक्नोलॉजी। गूगल पर हम सर्च करते हैं तो हमें हमारी जरूरत के मुताबिक जानकारी सामने आ जाती है। क्योंकि एक उपभोक्ता के नाते हमारा बर्ताव अलग-अलग होता है, इसलिए अगर मैं होटल लिखकर सर्च करता हूं तो मुझे कुछ और सजेशन आएंगे और आप करेंगे आपको कुछ और आ सकते हैं। हो सकता है कि सर्च इंजन आपको पांच हजार के कमरे बताए और मुझे हजार-बारह सौ वाले। कहने का आशय यह है कि तकनीक बहुत इंटेलिजेंट हो गई है।
आपको एक रोचक बात बताता हूं। अगर आपसे पूछा जाए कि आपके बारे में सबसे ज्यादा कौन जानता है। आप सब लोगों का जवाब अलग-अलग हो सकता है, लेकिन मेरा जवाब एक ही है, वह यह है कि हमारा मोबाइल हमको सबसे अच्छे से जानता है। मोबाइल हमें यह तक बता सकता है कि हमने छह महीने पहले क्या सर्च किया था। यदि आज आप पांच दोस्त बैठते हैं और यह चर्चा करते हैं कि मुझे जूते खरीदना है तो अगले ही समय से आपको जूते के विज्ञापन नजर आने लगेंगे। इसी तरह जैसे फेसबुक या यू-ट्यूब पर जिस तरह का कंटेंट हम देखते हैं, वैसा ही ज्यादा से ज्यादा कॉन्टेंट हमें दिखाया जाने लगता है। यह पर्सनलाइजेशन है। एजुकेशन में ऐसे ही पर्सनलाइजेशन की हम बात कर रहे हैं। तकनीक की मदद से यह संभव भी है। जब गूगल, फेसबुक या यू-ट्यूब की टीम अरबों लोगों को डील कर सकती है, उपभोक्ता और मनोरंजन के क्षेत्र में यह हो सकता है तो शिक्षा में क्यों नहीं। बिल्कुल हो सकता है। इसके लिए टेक्नोलॉजी ही काम करेगी।
मोशन करेगा 100 करोड़ का निवेश
मैं एक सामान्य परिवार से हूं और सामान्य बच्चों की समस्याओं को समझता हूं। हम शिक्षा के क्षेत्र में पर्सनलाइजेशन पर काम कर रहे हैं। मैं आपको बताते हुए खुश हो रहा हूं कि मैं और मेरी टीम पिछले पांच साल से इस दिशा में काम कर रही है। हम तकनीक की मदद से पर्सनलाइज और टॉप क्वॉलिटी एजुकेशन इन मिनिमम प्राइस प्वाइंट के मिशन पर काम कर रहे हैं। मोशन एजुकेशन छात्रों के लिए सीखने की प्रक्रिया कस्टमाइज करने के लिए 50 करोड़ रुपये का निवेश कर चुका है और इससे देश की पहली एआई बेस्ड होमवर्क मशीन तैयार की है।
यह मशीनें विशेष रूप से जेईई और नीट उम्मीदवारों के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इससे कमजोर से कमजोर ओर अत्यंत जहीन बच्चों को, उनकी क्षमता के मुताबिक बेहतर से बेहतर तैयारी करवाई जाती है। इसे हम विद्यार्थियों की कमियों को समझने और उनको दूर करने के लिए का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह प्रक्रिया व्यक्ति की विषय की समझ को बढ़ाती है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है और परीक्षा के मानक को पूरा करने के लिए प्रदर्शन धीरे-धीरे बढ़ता है। इसे मोशन के 50+ केंद्रों पर स्थापित किया गया है और अब तक 50,000+ छात्रों को फायदा मिला है।
बच्चों पर पढ़ाई का दबाव कम होगा
एआई बेस्ड होमवर्क मशीनें एक वरदान के रूप में सामने आई है। मशीन छात्रों की सीखने की व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर उनके पाठ्यक्रम संरचना की योजना बनाकर उन पर दबाव कम करने की क्षमता रखती हैं। हम इस मशीन की मदद से, संस्थान कस्टमाइज प्रेक्टिस शीट के साथ विद्यार्थियों की कमजोरी दूर कर उनके प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका उद्देश्य सलेक्शन पर्सेंटेज में सुधार करना है और वह हो भी रहा है।
आइए, बनाएं हैप्पी वर्ल्ड
अंत में कहूंगा कि जिस तरह हर बीमार का उपचार अलग-अलग होता है, वैसे ही हर बच्चे को उसके स्तर के मुताबिक एजुकेशनल कंटेंट मिलना चाहिए। अभ्यास के लिए सवाल मिलने चाहिए। आज सभी शिक्षण संस्थाओं का दायित्व है कि वह टॉपर्स को साथ रखें, उन पर काम करें लेकिन सामान्य बच्चों को पढ़ाने, निखारने पर भी काम करें। जब एवरेज बच्चा सफल होगा, वही हमारे असली सफलता होगी। मैं सभी शिक्षकों से अनुरोध करता हूं कि स्पेशलाइजेशन के सपने पर काम कीजिए। इसको सेलिब्रेट कीजिए। पढ़ाई का वर्तमान मॉडल हमें अफॉर्डेबल बना रहा है। शिक्षा का पर्सनलाइजेशन हर बच्चे के लिए उपयुक्त शिक्षा दे रहा है। यह दोनों मिलकर ही हैप्पी लर्नर दे पाएंगे। यदि दुनिया में हम ऐसा कर पाए तो इनोवेशन, क्रिएटिविटी, जॉब सेटिस्फेक्शन बढ़ाकर सच में हैप्पी वर्ल्ड बना पाएंगे।