वसुंधरा सरकार का कारनामा, भ्रष्ट पत्नी की जांच आईएएस पति को
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भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा और उसकी सरकारें बेशक कितने दावे करे लेकिन उनमें कितना दम है इसका अंदाजा राजस्थान की एक घटना से लगाया जा सकता है।
जहां राज्य प्रशासनिक सेवा की एक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच उसके आईएएस पति को ही सौंप दी गई। हालांकि पति ने खुद को जांच से अलग करना ही बेहतर समझा।
अंग्रेजी अखबार मेल टुडे की खबर के अनुसार रतन लाल लाहोटी आईएएस अफसर हैं, जबकि उनकी पत्नी राजस्थान प्रशासनिक सेवा की अधिकारी वीणा लाहोटी जोधपुर की डा. सर्वापल्ली आयुर्वेदिक यूनिवर्सिटी में कुलसचिव हैं।
उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक के बाद एक कई आरोप लगे थे जिनकी जांच प्रदेश सरकार ने उनके पति और डिविजनल कमिश्नर रतन लाल लाहोटी को सौंप दी। दिखावे के लिए आईएएस ऑफिसर ने खुद को इस जांच से अलग करने को कहा।
आरटीआई कार्यकर्ता ने की थी शिकायत
रतन लाल के लिए यह असमंजस भरी स्थिति थी। क्योंकि शिकायतों में जांच पर भी सवाल उठाए गए थे। मामले में सारी जांच के आदेश उस समय दिए गए थे जब जोधपुर के आरटीआई कार्यकर्ता नंदलाल व्यास और आरके पुरोहित ने इसकी शिकायत वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री से की थी।
इस संबंध में बात करने पर रतन लाल ने बताया कि मामला अप्रैल महीने का था जब उनकी पोस्टिंग जोधपुर के डिविजनल कमिश्नर के रूप में मई में हुई थी। मामले में शासन की ओर से जांच के आदेश एक नियमित कार्यवाही के तौर पर दिए गए थे।
जिसके बाद मैने अपने जूनियर अतिरिक्त डिविजनल कमिश्नर से कहा कि मैं मामले में जांच नहीं कर सकता क्योंकि इसमें मेरी पत्नी की संलिप्तता जुड़ी हुई है। मामले में डीओपी सेक्रेटरी विवेक कुमार ने 5 जून को शिकायतों पर तुरंत जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए।
यूनिवर्सिटी में कुलसचिव पत्नी पर हैं संगीन आरोप
वहीं सूत्रों के अनुसार इसके बाद जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंप दी गई। मामले में शिकायतकर्ता व्यास बताते हैं कि डीओपी का जांच के संबंध में पहला आदेश अप्रैल से पहले आया था जब डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को ही डिविजन कमिश्नर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था।
जबकि नया आदेश 5 जून को आया। वो आरोप लगाते हैं कि मामले में लाहोटी आधा सच बोलकर सच्चाई छुपा रहे हैं। व्यास बताते हैं कि रजिस्ट्रार वीणा के खिलाफ वित्तीय और अन्य अनियमितताओं की शिकायत दिसंबर 2014 से फरबरी 2015 के बीच दर्ज कराई गई।
लेकिन किसी मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिनमें विश्वविद्यालय में बाबुओं की नियुक्ति, कैंटीन का ठेका बिना उचित प्रक्रिया के किसी को देना जिससे विश्वविद्यालय को 21 लाख का नुकसान हुआ।