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यह गुलाल खास है क्योंकि इससे नहीं होता साइड इफेक्ट
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Fri, 10 Mar 2017 11:16 AM IST
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राजस्थान के उदयपुर जिले में वन विभाग की ओर से तैयार हर्बल गुलाल
- फोटो : Amar Ujala
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होली खेलने वालों को अक्सर यह चिंता रहती है कि रंग-गुलाल का उन पर कोई साइड इफेक्ट नहीं हो जाए। कोई स्किन प्राॅब्लम नहीं हो जाए। यह चिंता बाजिव भी है। आजकल बाजार में उपलब्ध रंग-गुलाल में केमिकल का उपयोग होता है। जिसके सम्पर्क में आने से कई तरह स्किन प्राॅब्लम और अन्य परेशानी हो जाती है।
ऐसे में राजस्थान के उदयपुर जिले में वन विभाग की ओर से तैयार करवाई जा रही हर्बल गुलाल की मांग लगातार बढ़ रही हैं। इस साल होली पर विभाग के पास करीब तीन क्विंटल हर्बल गुलाल का आर्डर है।
देशभर में हर्बल उत्पादों के प्रति जागरूकता को देखते हुए राजस्थान के वन विभाग ने उदयपुर जिले के कुछ गांवों में हर्बल गुलाल का उत्पादन प्रयोग के तौर पर वर्ष 2010 में शुरू किया। पहले साल मात्र 15 किलोग्राम गुलाल चौकड़िया में तैयार हुई। कुछ बची लेकिन, बाद में धीरे-धीरे मांग बढ़ती गई। स्थिति यह हो गई है कि विभाग जितनी हर्बल गुलाल तैयार करवाता है, सारी खप जाती है। विभाग की ओर से उदयपुर में बिक्री काउंटर भी स्थापित किए जाते है। हर्बल गुलाल मांग राजस्थान के विभिन्न इलाकों समेत दिल्ली, गुजरात में भी है।
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ऐसे में राजस्थान के उदयपुर जिले में वन विभाग की ओर से तैयार करवाई जा रही हर्बल गुलाल की मांग लगातार बढ़ रही हैं। इस साल होली पर विभाग के पास करीब तीन क्विंटल हर्बल गुलाल का आर्डर है।
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देशभर में हर्बल उत्पादों के प्रति जागरूकता को देखते हुए राजस्थान के वन विभाग ने उदयपुर जिले के कुछ गांवों में हर्बल गुलाल का उत्पादन प्रयोग के तौर पर वर्ष 2010 में शुरू किया। पहले साल मात्र 15 किलोग्राम गुलाल चौकड़िया में तैयार हुई। कुछ बची लेकिन, बाद में धीरे-धीरे मांग बढ़ती गई। स्थिति यह हो गई है कि विभाग जितनी हर्बल गुलाल तैयार करवाता है, सारी खप जाती है। विभाग की ओर से उदयपुर में बिक्री काउंटर भी स्थापित किए जाते है। हर्बल गुलाल मांग राजस्थान के विभिन्न इलाकों समेत दिल्ली, गुजरात में भी है।
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ऐसे बनती है हर्बल गुलाल
ऐसे बनती है हर्बल गुलाल
- फोटो : Amar Ujala
हर्बल गुलाल बनाने के लिए वन सुरक्षा समिति की सदस्य जंगलों में प्राकृतिक रूप से गिरे फूलों को एकत्र करती है। इन्हें सूखाकर पानी में उबाला जाता है। इस पानी को अरारोट में मिलाकर सुखाया जाता है। सूखने पर इसे बारीक पीसा जाता है और इसकी पैकिंग की जाती है।
अमलास के सूखे पत्तों से बनने वाली गुलाल का रंग पीला होता है। इसे रंग-ए-पलाश नाम दिया जाता है। पलाश के फूल से बनने वाली गुलाल लाल रंग की होती है। इसे रंग-ए-पलाश नाम दिया है। गुलाब के पत्तियों से रंग-ए-गुलाब बनता है और यह होता है गुलाबी। अब बात हो जाए हरे रंग की। रंग-ए-हरियाली विभिन्न तरह के पत्तों से बनता है।
आस्ट्रेलियन दूतावास भी बना ग्राहक
हर्बल गुलाल का ग्राहक दिल्ली स्थित आस्ट्रेलियन दूतावास भी है। दूतावास ने इस साल करीब 65 किलोग्राम हर्बल गुलाल का आॅर्डर दिया है।
अमलास के सूखे पत्तों से बनने वाली गुलाल का रंग पीला होता है। इसे रंग-ए-पलाश नाम दिया जाता है। पलाश के फूल से बनने वाली गुलाल लाल रंग की होती है। इसे रंग-ए-पलाश नाम दिया है। गुलाब के पत्तियों से रंग-ए-गुलाब बनता है और यह होता है गुलाबी। अब बात हो जाए हरे रंग की। रंग-ए-हरियाली विभिन्न तरह के पत्तों से बनता है।
आस्ट्रेलियन दूतावास भी बना ग्राहक
हर्बल गुलाल का ग्राहक दिल्ली स्थित आस्ट्रेलियन दूतावास भी है। दूतावास ने इस साल करीब 65 किलोग्राम हर्बल गुलाल का आॅर्डर दिया है।