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गुर्जर आंदोलनः जानिए क्या है विवाद और क्यों सुलग रहा है राजस्थान

Tue, 26 May 2015 04:09 PM IST
Updated Tue, 26 May 2015 04:09 PM IST
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gurjar andolan in rajsthan

पिछले पांच दिनों से देश का मध्यभाग राजस्थान रह-रहकर सुलग रहा है। अलग से पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान के गुर्जर पिछले कई दिनों से रेल पटरियों और नेशनल हाइवे पर जमे हुए हैं। इसके चलते जहां दिल्ली-मुंबई रेल रूट पूरी तरह ठप होने के कारण सौ से ज्यादा ट्रेनों को रद करना पड़ा है वहीं दिल्ली-जयपुर हाइवे पर भी आवाजाही ठप है।

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दो दिनों से सरकार और गुर्जरों के बीच चल रही वार्ता एक बार फिर पटरी से उतर गई है। ऐसे में गुर्जरों का आंदोलन फिर पूर्व की तरह लंबे समय तक खिंचने की आंशका जताई जा रही है।
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ऐसा नहीं है कि राजस्थान और बाकी देश को इस समस्या से पहली बार जूझना पड़ा है, इससे पहले भी कई बार गुर्जर आरक्षण की मांग को लेकर अपना रौद्र रूप दिखा चुके हैं।
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आरक्षण को लेकर गुर्जरों की यह लड़ाई पिछले कई दशक से चल रही है। आंदोलनकारी गुर्जरों की प्रमुख मांग अपनी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण खुद के लिए अलग से आरक्षण की है।

एक दशक से रह रहकर सुलग रहा है राजस्‍थान

gurjar andolan in rajsthan

पूर्व में आंदोलन के दौरान गुर्जरों ने खुद को अनुसूचति जन जाति में रखने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा था जिसमें बदलाव करते हुए अब अलग से पांच प्रतिशत आरक्षण मांगा गया है। राजस्‍थान की जनसंख्या में 5 फीसदी हिस्सेदारी के साथ गुर्जरों की कुल तादाद लगभग 25 लाख के करीब है।

देश के अन्य राज्यों के मुकाबले राजस्‍थान में गुर्जर आर्थिक और सामाजिक रूप से वाकई पिछड़े माने जाते हैं, इसलिए वो सन 1960 से ही आरक्षण के लिए आवाज उठाते रहे हैं। लेकिन आंदोलन की ये चिंगारी साल 2008 में उस समय शोला बन गई जब आरक्षण की मांग को लेकर पटरियों पर जमे गुर्जरों पर 23 मई को पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई।

इसके विरोध में भड़की हिंसा को रोकने के लिए पुलिस को फिर फायरिंग करनी पड़ी जिसमें 17 लोगों की और जान चली गई। इसके बाद हालात बेकाबू हुए तो सेना को बुलाना पड़ा। कई दिनों तक चले बवाल के बाद भाजपा की तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने गुर्जरों को आरक्षण देने के लिए अलग से कमेटी का गठन किया गया था।

उसके बाद से साल 2010 में भी एक बार फिर गुर्जर आंदोलन भड़का लेकिन तब जल्द ही मामला शांत पड़ गया। हाल में फिर यह झगड़ा उस समय उभर कर सामने आ गया जब कोर्ट ने गुर्जरों को दिए जाने वाले पांच फीसदी आरक्षण को घटाकर मात्र एक फीसदी कर दिया।

यूं पड़ी राजस्‍थान में गुर्जर आंदोलन की नींव

gurjar andolan in rajsthan

कोर्ट के अनुसार राजस्‍थान में पहले से ही 49 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है ऐसे में इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता। असल में राजस्‍थान में गुर्जरों के आंदोलन की एक बड़ी वजह वहां मीणा समाज से उनका लंबे समय से चला आ रहा सामजिक टकराव भी है।

राजस्‍थान में मीणा समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से गुर्जरों से काफी समृद्ध और विकसित है। संपन्नता और आबादी के हिसाब से भी वो गुर्जरों से काफी आगे हैं लेकिन उनकी गिनती वहां अनुसूचित जनजाति में होती है। जिससे उन्हें केन्द्रीय सूची में आरक्षण का भी अच्छा लाभ मिलता है।

ऐसे में पहले से ही संपन्न मीणा समाज आरक्षण का लाभ पाकर केन्द्र और राज्य सरकार की नौकरियों में अपनी पकड़ बना चुका है। यही टीस राजस्‍थान के गुर्जरों को लंबे समय से सालती रही है, उनसे हर तरह से संपन्न होने के बाद भी मीणा समाज आरक्षण का लाभ ले रहा है जबकि वो हर तरह से पिछड़े होने के बाद भी ओबीसी में ही हैं।

रही सही कसर 90 के दशक में राजस्‍थान में जाटों को ओबीसी में आरक्षण दिए जाने से पूरी हो गई। राजस्‍थान में जाटों की गिनती राजा-रजवाडों और संपन्न बिरादरियों में होती है।

70 से ज्यादा जान जा चुकी हैं आंदोलन की लड़ाई में

gurjar andolan in rajsthan

ऐसे में आरक्षण मिलते ही ओबीसी के एक बड़े हिस्से पर जाटों और दूसरी बिरादरियों का कब्जा हो गया जिसके बाद से गुर्जर खुद को वहां उपेक्षित महसूस करने लगे। यहीं से राजस्‍थान में गुर्जर आंदोलन की नींव पड़नी शुरू हो गई।

आलम ये है कि साल 2008 से अब तक हुए कई आंदोलनों में 70 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और अरबों की संपति को नुकसान पहुंच चुका है। राजस्‍थान में बिरादरियों की इस लड़ाई को राजनीतिक दलों ने समय समय पर अपने अनुसार इस्तेमाल किया किसी की भी इच्छा इसके निस्तारण में नहीं रही।

हर कोई मामले का पुख्ता हल निकालने के बजाय इसे अगली सरकारों पर टालकर राजनीतिक लाभ लेने के मकसद में लगा रहा। दशकभर से चल रहे इस आंदोलन को खत्म करने में न पूर्व की राजे सरकार ने दिलचस्पी ली न अशोक गहलोत सरकार ने।

वसुंधरा राजस्‍थान में अपनी दूसरी पारी शुरू कर चुकी हैं तो केन्द्र में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है लेकिन गुर्जरों का यह मुद्दा इस बार भी सुलझता नहीं दिख रहा है।

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