निकाय चुनाव: पहले संसद, फिर पंचायत और पालिका... भीलवाड़ा के नेताओं का अनोखा राजनीतिक सफर
भीलवाड़ा की राजनीति में दो ऐसे अनोखे उदाहरण सामने आते हैं, जहां नेताओं का राजनीतिक सफर संसद तक पहुंचने के बाद स्थानीय राजनीति की ओर लौटा। पूर्व सांसद हेमेंद्रसिंह बनेड़ा 25 साल की उम्र में लोकसभा सांसद बने और बाद में वर्ष 1987 में बनेड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच चुने गए।
विस्तार
राजनीति में आमतौर पर सफर स्थानीय स्तर से शुरू होकर धीरे-धीरे विधानसभा और फिर संसद तक पहुंचता है। पहले वार्ड, ग्राम पंचायत या नगर निकाय की राजनीति, उसके बाद विधानसभा और अंत में लोकसभा तक पहुंचना नेताओं की सामान्य राजनीतिक यात्रा मानी जाती है। लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा की राजनीतिक जमीन पर इसके उलट सफर के दो दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। यहां दो ऐसे नेता रहे, जो संसद तक पहुंचे और उसके बाद फिर स्थानीय राजनीति में लौटे। इनमें पूर्व सांसद हेमेंद्रसिंह बनेड़ा और पूर्व सांसद एवं मंत्री रामपाल उपाध्याय शामिल हैं।
दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा इस मायने में खास रही कि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर प्रतिनिधित्व करने के बाद भी उन्होंने स्थानीय संस्थाओं से अपना रिश्ता बनाए रखा। हेमेंद्रसिंह बनेड़ा सांसद बनने के बाद ग्राम पंचायत बनेड़ा के सरपंच चुने गए, जबकि रामपाल उपाध्याय सांसद रहने के बाद नगर पालिका में मनोनीत पार्षद बने। यह राजनीतिक सफर उस दौर की राजनीति की एक अलग तस्वीर सामने रखता है, जब बड़े संवैधानिक पद तक पहुंचने के बावजूद स्थानीय जनता और स्थानीय संस्थाओं से जुड़े रहना महत्वपूर्ण माना जाता था।
25 साल की उम्र में संसद पहुंचे, बाद में बने सरपंच
हेमेंद्रसिंह बनेड़ा का राजनीतिक सफर अपने आप में बेहद खास रहा। वर्ष 1971 में महज 25 वर्ष 3 माह की उम्र में जनसंघ के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर उन्होंने देश में सबसे कम उम्र में सांसद बनने का रिकॉर्ड बनाया था। जिस उम्र में अधिकांश युवा राजनीति में अपनी पहचान बनाने की शुरुआत कर रहे थे, उसी उम्र में हेमेंद्रसिंह देश की संसद में पहुंच चुके थे। हालांकि, उनकी राजनीतिक यात्रा केवल संसद तक सीमित नहीं रही। सांसद बनने के करीब डेढ़ दशक बाद वर्ष 1987 में वे बनेड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच चुने गए। इस तरह देश की संसद में बैठ चुके एक नेता ने अपने क्षेत्र की ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी भी संभाली। उनके राजनीतिक जीवन का यह पड़ाव आज की राजनीति के संदर्भ में भी खासा रोचक नजर आता है।
इसके बाद वर्ष 1989 में जनता दल के टिकट पर वे दूसरी बार लोकसभा पहुंचे। संसद में उन्होंने संस्कृत भाषा में शपथ लेकर भी अपनी अलग पहचान बनाई। हेमेंद्रसिंह बनेड़ा को सिद्धांतों की राजनीति के लिए जाना जाता था। वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के करीबी माने जाते थे। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में उन्होंने युद्धविराम के प्रस्ताव का विरोध कर अपनी राजनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया था।
सांसद से मनोनीत पार्षद बने रामपाल उपाध्याय
भीलवाड़ा की राजनीति में दूसरा ऐसा उदाहरण पूर्व मंत्री एवं सांसद रामपाल उपाध्याय का है। उपाध्याय लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय रहे। वे तीन बार विधायक और एक बार सांसद रहे। वर्ष 1998 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1998 से 1999 तक सांसद रहे। इससे पहले वे राज्य सरकार में उच्च शिक्षा एवं रोजगार मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे। यानी विधायक से मंत्री और फिर सांसद तक का राजनीतिक सफर तय करने वाले रामपाल उपाध्याय की सियासत का दायरा प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच चुका था।
लेकिन संसद से निकलने के बाद भी उनका स्थानीय राजनीति से नाता खत्म नहीं हुआ। वर्ष 2000 में गंगापुर नगर पालिका अध्यक्ष आनंदी माली के कार्यकाल के दौरान वे मनोनीत पार्षद बने। उनका यह राजनीतिक सफर भी अपने आप में उलटा था। आम तौर पर स्थानीय निकाय का प्रतिनिधि विधानसभा और फिर संसद की ओर बढ़ता है, लेकिन रामपाल उपाध्याय ने सांसद रहने के बाद नगर पालिका में पार्षद की भूमिका स्वीकार की।
बड़े पद से ज्यादा जनता से जुड़ाव का संदेश
हेमेंद्रसिंह बनेड़ा और रामपाल उपाध्याय की राजनीतिक यात्राएं केवल इतिहास का दिलचस्प हिस्सा नहीं हैं, बल्कि स्थानीय राजनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती हैं। सांसद बनने के बाद ग्राम पंचायत या नगर पालिका जैसे स्थानीय संस्थानों से जुड़ना इस बात का संकेत था कि राजनीति में पद से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता के बीच सक्रिय रहना माना जाता था।
हेमेंद्रसिंह बनेड़ा का सांसद से सरपंच और रामपाल उपाध्याय का सांसद से मनोनीत पार्षद बनने का सफर आज की चुनावी राजनीति के लिए भी अलग तरह का उदाहरण पेश करता है। आज जहां स्थानीय निकाय के चुनावों को विधानसभा और लोकसभा की राजनीति की सीढ़ी माना जाता है, वहीं भीलवाड़ा के इन दोनों नेताओं की कहानी बताती है कि राजनीतिक जीवन की दिशा हमेशा एक ही ओर नहीं जाती। कभी-कभी संसद की ऊंचाइयों तक पहुंचने के बाद नेता फिर उसी स्थानीय जमीन पर लौटता है, जहां से उसकी राजनीति को जनाधार और पहचान मिली थी।
भीलवाड़ा की सियासत का अनोखा अध्याय
दोनों नेताओं के राजनीतिक सफर में सबसे खास समानता यही रही कि संसद तक पहुंचने के बाद भी उनका स्थानीय राजनीति से रिश्ता बना रहा। एक ने ग्राम पंचायत की कमान संभाली तो दूसरे ने नगर पालिका में पार्षद की भूमिका निभाई।
सांसद से सरपंच और सांसद से पार्षद तक का यह सफर भीलवाड़ा की राजनीतिक विरासत का ऐसा अध्याय है, जिसमें सत्ता के बड़े मंच और स्थानीय लोकतंत्र के बीच की दूरी मिटती दिखाई देती है।