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प्रबल इच्छाशक्ति से पाई कैंसर पर जीत: पटियाला की एसएमओ ने स्तन कैंसर को दी मात, अब मरीजों की सेवा में जुटीं 

Fri, 04 Feb 2022 03:58 PM IST
निवेदिता वर्मा रिंपी गुप्ता, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब)
रिंपी गुप्ता, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 04 Feb 2022 03:58 PM IST
सार

डा. आरती पांडव ने बताया कि शुरू में जब उन्हें अपनी बीमारी का पता लगा, तो एक बार के लिए तो वह अंदर से टूट गईं। उस समय बेटी बारहवीं व बेटा दसवीं क्लास में था।  लेकिन पति सर्जन डा. पारस कुमार पांडव व बच्चों के साथ से उन्होंने खुद को संभाला और इस बीमारी के खिलाफ लड़ने का मन बनाया।

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Story of Cancer Survivor Dr. aarti pandav of Patiala
कैंसर

विस्तार

किसी ने सच ही कहा है कि अगर प्रबल इच्छाशक्ति है, तो दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं, जिसे पाना असंभव हो। पटियाला के सरकारी माता कौशल्या अस्पताल की एसएमओ स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. आरती पांडव (58) पर यह बात सटीक बैठती है। साल 2008 में 44 साल की आयु में डा. आरती को पता लगा कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। करीब सात साल उन्होंने इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ बड़ी मजबूती व दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ लड़ाई लड़ी। आज वह स्वस्थ हैं और पहले की तरह मरीजों की सेवा में जुटी हैं।

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अमर उजाला से बात करते हुए डा. आरती पांडव ने बताया कि शुरू में जब उन्हें अपनी बीमारी का पता लगा, तो एक बार के लिए तो वह अंदर से टूट गईं। उस समय बेटी बारहवीं व बेटा दसवीं क्लास में था।  लेकिन पति सर्जन डा. पारस कुमार पांडव व बच्चों के साथ से उन्होंने खुद को संभाला और इस बीमारी के खिलाफ लड़ने का मन बनाया। पहले एक साल इलाज में गया और अगले दो साल इलाज दौरान खाईं दवाओं व कीमोथरेपी के साइड इफेक्ट से निकलने में लगे। 
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करीब सात साल उन्होंने इस बीमारी के खिलाफ जंग लड़ी और विजेता बनकर बाहर निकलीं। अबकी शुरुआत में वर्कप्लेस पर सहयोगियों ने साथ दिया पर कैंसर के खिलाफ लड़ाई लंबी होने कारण बाद में कुछ दिक्कतें आईं। वह इन सबसे हारी नहीं। अब तो पिछले कई सालों से वह पहले की तरह पूरी ताकत से अपने मरीजों की सेवा में लगी हैं। वह लोगों को यही अपील करती हैं कि कोई भी तकलीफ होने पर तुरंत डाक्टर पास जाएं। कैंसर का इलाज है, पहली स्टेज में पता लगने पर सही डाक्टर से उपचार शुरू करा लिया जाए। महत्वपूर्ण बात यह है कि बीच में इलाज छोड़े नहीं, पूरा उपचार कराएं। 

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कैंसर से मां को खोया, वाहेगुरु की मर्जी मान जीना सीखा

पटियाला में ड्राइविंग स्कूल चलाने वाले 57 साल के अमरीक सिंह ने करीब पांच साल पहले अपनी मां कमलेश कौर को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के कारण हमेशा के लिए खो दिया था। अमर उजाला से बात करते हुए अमरीक सिंह ने कहा कि उन्हें व पूरे परिवार को मां को खोने का दुख अभी भी है, लेकिन इसे वाहेगुरु की मर्जी मानकर जीना सीख लिया है। 


बस यही सोचते हैं कि दुनिया में हमसे भी अधिक दुखी लोग हैं, लेकिन उनकी मौत से एक सीख ली है। अगर किसी भी प्रकार का शारीरिक कष्ट हो, तो तुरंत डाक्टर के पास जाकर इलाज करवाएं, किसी छोलाझाप के चक्कर में न फंसे। इस बारे में वह हमेशा अपनी जान-पहचान वालों और दोस्तों-रिश्तेदारों को भी जागरूक करते हैं। 


अमरीक सिंह ने बताया कि 10 साल पहले उनकी मां के फेफड़ों में एक गांठ बन गई थी, जिसमें काफी दर्द भी रहता था। पहले अपने स्तर वह दर्द रोकने को दवाएं लेते रहे, बाद में पटियाला के एक सरकारी अस्पताल ले गए। उनको भी बीमारी का पता न लगा। बाद में बनूड़ के एक नजदीक एक प्राइवेट अस्पताल लेकर गए, वहां के डाक्टरों ने कैंसर का शक जताया और उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ जाने की सलाह दी। पहले माता जी पीजीआई जाने को नहीं मानी, बाद में बड़ी मुश्किल से लेकर गए। वहां जाकर टेस्ट कराने बाद पता लगा कि उन्हें फेफड़ों का कैंसर है, जो आखिरी स्टेज पर था। काफी समय पीजीआई से इलाज चलता रहा, लेकिन फिर माता जी ने काफी समझाने के बावजूद इलाज बीच में छोड़ दिया और बहन के पास गांव चले गए। वहां जाकर तबीयत और खराब हुई, तो स्थानीय डाक्टरों से दवा लेने लगे, लेकिन मां बिस्तर पर पड़ गईं और बाद में उनकी मौत हो गई। 

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