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Patiala News: डिप्रेशन में दवाओं के साथ एमबीसीटी थेरेपी ज्यादा कारगर, पीयू की शोध
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पीजीआई चंडीगढ़ से डिप्रेशन के साथ जूझते 80 केसों पर आधारित की शोध
थेरेपी में मरीजों के ठीक होने की प्रतिशतता 52, तो केवल दवाओं के साथ 22 फीसदी मरीज ही ठीक हुए
थेरेपी के इस्तेमाल के लिए कापीराइट की मंजूरी गिलफोर्ड प्रेस से प्राप्त की गई : शोधकर्ता दीक्षा
अमर उजाला ब्यूरो
पटियाला। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में डिप्रेशन की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसी के मद्देनजर पीजीआई चंडीगढ़ के सहयोग से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के मनोविज्ञान विभाग की ओर से की एक ताजा शोध की गई है। इसमें ये ठोस नतीजे सामने आए हैं कि डिप्रेशन के मरीजों के लिए केवल दवाओं का इस्तेमाल करना उतना कारगर साबित नहीं होता, जितना दवाओं के साथ-साथ एमबीसीटी के नाम से जानी जाती माइंडफुलनेस-बेस्ड कोगनिटिव थेरेपी को इस्तेमाल करना।
निगरान प्रोफेसर हरप्रीत कौर की अगुवाई में शोधकर्ता दीक्षा सचदेवा की ओर से यह शोध की गई। पीजीआई चंडीगढ़ से डाॅ. संदीप ग्रोवर ने इस शोधकार्य के दौरान सह निगरान की भूमिका निभाई। प्रोफेसर हरप्रीत कौर ने बताया कि पीजीआई चंडीगढ़ में डिप्रेशन के साथ जूझते 80 विभिन्न केसों को लेकर दो समूहों में बांटा गया था, जिनमें से एक समूह का केवल दवाओं के साथ इलाज किया गया। जबकि दूसरे समूह को दवाओं के साथ-साथ एमबीसीटी के नाम के साथ जानी जाती माइंडफुलनेस-बेस्ड कोगनिटिव थेरेपी भी दी गई। उन्होंने बताया कि इन 80 केसों से पहले दो महीनों के बाद और फिर छह महीनों के बाद प्राप्त आंकड़ों को शोधकार्य में विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया गया।
उन्होंने बताया कि डिप्रेशन के मरीजों के लिए केवल दवाओं के इस्तेमाल वाली स्थिति के मुकाबले थेरेपी के साथ दवाओं का असर ज्यादा होने के बारे में पता लगा है। इस थेरेपी में सीखे गए मुख्य हुनरों जैसे जागरूकता, चेतनता, अतीत और भविष्य में रहने के बजाय वर्तमान में जीना, ध्यान एक ही जगह केंद्रित न करना को विभिन्न सेशनों के जरिये मरीजों तक पहुंचाया गया, जिसका उन पर अच्छा असर सामने आया।
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शोधकर्ता दीक्षा सचदेवा ने बताया कि यह शोध पीजीआई चंडीगढ़ से मनोविज्ञान विभाग के डाॅ. संदीप ग्रोवर की अगुवाई में हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पूरी हुई है। इस थेरेपी के इस्तेमाल के लिए कापीराइट की मंजूरी गिलफोर्ड प्रेस से प्राप्त की गई है। इस अध्ययन के अहम पड़ाव के तौर पर मरीजों को टेली मोड के 10-12 सेशनों के जरिये यह थेरेपी प्रदान की गई थी। थेरेपी वाली स्थिति में मरीजों के ठीक होने की प्रतिशतता 52 रही, जबकि केवल दवाओं के इस्तेमाल के साथ 22 फीसदी मरीज ही ठीक हुए।
वीसी प्रोफेसर अरविंद ने खोज टीम को बधाई देते कहा कि डिप्रेशन के इलाज के लिए केवल दवाओं के इस्तेमाल के अलावा ऐसी विधियों के इस्तेमाल से मरीजों को निश्चित ही राहत मिलती है। इसलिए विभिन्न संस्थाओं को चाहिए कि वह इस किस्म के इलाज ढूंढ़ें।
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थेरेपी में मरीजों के ठीक होने की प्रतिशतता 52, तो केवल दवाओं के साथ 22 फीसदी मरीज ही ठीक हुए
थेरेपी के इस्तेमाल के लिए कापीराइट की मंजूरी गिलफोर्ड प्रेस से प्राप्त की गई : शोधकर्ता दीक्षा
अमर उजाला ब्यूरो
पटियाला। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में डिप्रेशन की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसी के मद्देनजर पीजीआई चंडीगढ़ के सहयोग से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के मनोविज्ञान विभाग की ओर से की एक ताजा शोध की गई है। इसमें ये ठोस नतीजे सामने आए हैं कि डिप्रेशन के मरीजों के लिए केवल दवाओं का इस्तेमाल करना उतना कारगर साबित नहीं होता, जितना दवाओं के साथ-साथ एमबीसीटी के नाम से जानी जाती माइंडफुलनेस-बेस्ड कोगनिटिव थेरेपी को इस्तेमाल करना।
निगरान प्रोफेसर हरप्रीत कौर की अगुवाई में शोधकर्ता दीक्षा सचदेवा की ओर से यह शोध की गई। पीजीआई चंडीगढ़ से डाॅ. संदीप ग्रोवर ने इस शोधकार्य के दौरान सह निगरान की भूमिका निभाई। प्रोफेसर हरप्रीत कौर ने बताया कि पीजीआई चंडीगढ़ में डिप्रेशन के साथ जूझते 80 विभिन्न केसों को लेकर दो समूहों में बांटा गया था, जिनमें से एक समूह का केवल दवाओं के साथ इलाज किया गया। जबकि दूसरे समूह को दवाओं के साथ-साथ एमबीसीटी के नाम के साथ जानी जाती माइंडफुलनेस-बेस्ड कोगनिटिव थेरेपी भी दी गई। उन्होंने बताया कि इन 80 केसों से पहले दो महीनों के बाद और फिर छह महीनों के बाद प्राप्त आंकड़ों को शोधकार्य में विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया गया।
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उन्होंने बताया कि डिप्रेशन के मरीजों के लिए केवल दवाओं के इस्तेमाल वाली स्थिति के मुकाबले थेरेपी के साथ दवाओं का असर ज्यादा होने के बारे में पता लगा है। इस थेरेपी में सीखे गए मुख्य हुनरों जैसे जागरूकता, चेतनता, अतीत और भविष्य में रहने के बजाय वर्तमान में जीना, ध्यान एक ही जगह केंद्रित न करना को विभिन्न सेशनों के जरिये मरीजों तक पहुंचाया गया, जिसका उन पर अच्छा असर सामने आया।
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शोधकर्ता दीक्षा सचदेवा ने बताया कि यह शोध पीजीआई चंडीगढ़ से मनोविज्ञान विभाग के डाॅ. संदीप ग्रोवर की अगुवाई में हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पूरी हुई है। इस थेरेपी के इस्तेमाल के लिए कापीराइट की मंजूरी गिलफोर्ड प्रेस से प्राप्त की गई है। इस अध्ययन के अहम पड़ाव के तौर पर मरीजों को टेली मोड के 10-12 सेशनों के जरिये यह थेरेपी प्रदान की गई थी। थेरेपी वाली स्थिति में मरीजों के ठीक होने की प्रतिशतता 52 रही, जबकि केवल दवाओं के इस्तेमाल के साथ 22 फीसदी मरीज ही ठीक हुए।
वीसी प्रोफेसर अरविंद ने खोज टीम को बधाई देते कहा कि डिप्रेशन के इलाज के लिए केवल दवाओं के इस्तेमाल के अलावा ऐसी विधियों के इस्तेमाल से मरीजों को निश्चित ही राहत मिलती है। इसलिए विभिन्न संस्थाओं को चाहिए कि वह इस किस्म के इलाज ढूंढ़ें।