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तकनीक में फिस्ड्डी, समस्याएं अपार, कैसे होगा मेड इन इंडिया साकार

Fri, 31 Jul 2020 02:15 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Fri, 31 Jul 2020 02:15 AM IST
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Lack of technology, problems immense, how will Made in India come true
मोहाली। सरहदों की सुरक्षा सैनिक कर रहे हैं, लेकिन देश को सशक्त बनाने के लिए सिविल सेक्टर का अहम योगदान है। कोविड-19 के बीच ‘मेड इन इंडिया’ इसी दिशा में एक नारा, एक सपना बनकर उभरा है। जिसे साकार करने का जिम्मा इंडस्ट्री पर है। वीआईपी सिटी मोहाली की इंडस्ट्री युवाओं की इंडस्ट्री है, लेकिन युवाओं की इस युवा इंडस्ट्री के सामने तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रांस्पोर्टेशन, रॉ मैटीरियल, स्किल्ड इंप्लायमेंट सहित अनेक स्थानीय समस्याएं हैं। पैकेेज के लॉलीपॉप और राज्य सरकारों के नकारापन से जूझती इंडस्ट्री कैसे आत्मनिर्भर भारत में योगदान दे पाएगी। मोहाली इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के सहयोग से अमर उजाला के वेबिनार में यही मुद्दे उभर कर सामने आए।
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अमर उजाला ने वीरवार को मोहाली इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के सहयोग से एक वेबिनार का आयोजन किया। जिसमें मोहाली के उद्योगपतियों ने आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के संकल्प के लिए सरकार के साथ खड़े होने की बात की। इसके साथ ही इनका कहना था कि केंद्र सरकार के राहत पैकेज का सीधा लाभ कुछ को तो मिला, लेकिन ज्यादातर घोषणाएं कागजी हैं। वहीं, राज्य सरकारों के नकारापन से इंडस्ट्री आहत है।
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पंजाब सरकार ने अपने स्तर पर इंडस्ट्री को राहत देने की बजाय बोझ ही डाला है। ऐसे में पंजाब को इंडस्ट्रियल हब बनाने की बात और पंजाबी युवाओं के पलायन को रोकना महज सियासी वादे हैं, जो सरकार-दर-सरकार नए फ्लेवर में वोट हासिल करने के लिए सामने आते हैं। राज्य में रहीं अकाली-भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने की दिशा में ठोस काम नहीं किया। जिन देशों से मुकाबला करने का सपना है उनकी तर्ज पर लेबर वेलफेयर, आवास, शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्रों पर कोई काम न तो किया गया और न ही उसके लिए कोई रोड मैप है। कोविड-19 के दौर में केंद्र से कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन राज्य सरकार ने अतिरिक्त बोझ ही डाला है। केंद्र से भी जो राहत मिली उनमें से अधिकांश कागजी हैं।
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यह हैं इंडस्ट्री के पांच अहम मुद्दे
मुद्दा - 1
पानी पीने के लिए भी विदेश पर निर्भर
तकनीक का फिस्ड्डीपन आत्मनिर्भर भारत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। भले ही भारतीय जुगाड़ में बेहतर हों, लेकिन दैनिक व्यवहार की तकनीक में हम फिस्ड्डी हैं। हर घर में नल है, जिसमें सेरिमिक डिस्क का इस्तेमाल होता है। छोटी सी इस डिस्क का काम पानी के लिए नल खोलने और बंद करने के लिए होता है। भारत में यह सेरिमिक डिस्क चीन या यूरोप से आती है। नल बनाने वाली इंडस्ट्री इसे वहीं से मंगाती है। उद्योगपतियों का मानना है कि भारतीय लेबर चीन और यूरोप से कहीं ज्यादा मेहनती और सक्षम है, इसके बावजूद बेसिक यूज के कंपोनेंट्स के लिए हम आकर्षित हैं। इसके लिए सरकार को रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर सार्थक रूप से खर्च करने की जरूरत है।
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मुद्दा - 2
डिग्रियां तो हैं पर आइडिया नहीं
आत्मनिर्भर भारत के लिए स्किल की जरूरत है। देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों की भरमार है। उच्च तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में देश के सरकारी संस्थान बेहतर हैं। जिनमें हर किसी को दाखिला नहीं मिल पाता, ऐसे में पैसे के बूते डिग्री की चाह रखने वालों के लिए यह अधिकांश प्राइवेट संस्थान वरदान तो साबित हो रहे हैं। लेकिन इन संस्थानों से पासआउट होने वाले डिग्री होल्डर तो होते हैं, पर इनके पास न तो नए आइडिया है और न ही इनोवेशन की क्षमता। सरकारी तकनीकी संस्थानों के पास आउट बड़ी कंपनियों या विदेशों का रुख करते हैं और प्राइवेट संस्थानों से नाम मात्र की डिग्रियां हासिल करने वाले देशी इंडस्ट्री पर बोझ साबित होते हैं।
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मुद्दा - 3
इंफ्रास्ट्रक्चर और बेसिक सुविधाओं पर राज्य सरकारों का नकारापन
इंफ्रास्ट्रक्चर और बेसिक सुविधाओं को लेकर पंजाब की राज्य सरकारों ने हमेशा ही उद्योग जगत की उपेक्षा की है। देश में सबसे मंहगा पैट्रोल और डीजल पंजाब में है। कोरोना काल में भी लोगों को इनमें राहत नहीं दी गई। पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भी बिजली के फिक्सड चार्ज वसूले गए। जिससे बंद रही हैवीलोड इंस्डट्री को अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा। राज्य सरकारों ने इंडस्ट्रियल एरिया को कॉलोनियों की तरह डेवलप किया। जिनमें रोड, वाटर सप्लाई और सीवरेज जैसी मूलभूत जरूरतों को लेकर खानापूर्ति ही की गई। इन तमाम समस्याओं के बावजूद पंजाब में लैंड रेट देश के अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा है।
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मुद्दा - 4
कामगारों के लिए कोई सुविधा नहीं
उद्योग चलाने में जितना योगदान पूंजी का है उससे ज्यादा योगदान वहां काम करने वाले कामगारों का है। यह कामगार ही अपनी मेहनत से पूंजी का सदुपयोग कर उद्योग जगत को सफल बनाते हैं। उद्योगपति भी इस बात को स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि जब तक कामगार खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे तब तक उनमें स्थायित्व नहीं आ सकता। उद्योगपति इस बात को लेकर राज्य सरकार से खासे नाराज हैं कि इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप करते हुए कामगारों के आवास, बच्चों की शिक्षा और परिवार की सेहत संबंधी जरूरतों को नजरंदाज किया जाता है। जबकि जिन देशों से हम मुकाबला कर हम आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, उन देशों में इन्हें प्राथमिकता दी जाती है।

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मुद्दा - 5
राहत पैकेज के नाम पर केंद्र का लॉलीपॉप
कोविड-19 के दौरान केंद्र सरकार ने एमएसएमई के लिए बड़े राहत पैकेज की घोषणा की। इसके अलावा भी कुछ राहत दी। जिसमें पीएफ और ईएसआई जैसी राहतों का फायदा भी हुआ। लेकिन राहत पैकेज के नाम पर जो घोषणाएं हुईं उनमें से अधिकांश लॉलीपॉप हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि इनके आधार पर बैंकों ने 20 प्रतिशत अतिरिक्त लिमिट देकर अपना धंधा बढ़ाया है और सरकार लोन दे रही है, लोन लेने से इंडस्ट्री की समस्या हल होने वाली नहीं है। ब्रिटेन सहित यूरोपीय देशों ने इंडस्ट्री को टैक्स रिबेट और इंस्टॉलमेंट सहित कई सुविधाएं दीं, जबकि इनसे उलट भारत में राहत के नाम पर ब्याज दरों का खेल खेला गया।
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वेबिनार में इन्होंने रखे विचार
- योगेश सागर, प्रेसिडेंट मोहाली इंडस्ट्रियल एसोसिएशन
- विवेक कपूर, डायरेक्टर एक्वा सिस्टम्स
- राजीव गुप्ता, एमडी सेनर्जी मैट्ल्स प्राइवेट लिमिटेड
- इंद्रजीत सिंह छाबड़ा, मैनेजिंग पार्टनर, कांटिनेंटल इंजीनियरिंग वर्क्स
- जगदीप सिंह, प्रोपराइटर, मेकिंग वेयज ऑटो इंडस्ट्री
-इकबाल सिंह, प्रोपराइटर, कॉमेंट्स इंडस्ट्री
- कमल कुमार दुप्पर, प्रोपराइटर, ओहरी इंडस्ट्री
- गगन छाबड़ा, पार्टनर, ऑर्डिसन्स एसोसिएट्स
- अनुराग अग्रवाल, पार्टनर, पी.के. इंडस्ट्रीज
- हरिओम वर्मा, रमानी प्रिसिजन मशीन प्रा. लि.
- अशोक गुप्ता, डिप्लास्ट प्लास्टिक्स
- इंद्र मोहन सिंह, एमसन ट्रांस्फार्मर्स
- एचएस चीमा, चीमा बायर्ल्स
- आरके लूथरा, अतुल फास्टनर्स लि.
- राजीव सयाल, सयाल एंड एसोसिएट्स
- संजीव गर्ग, आरबी फारजिन्स
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