चंडीगढ़ रूट की दर्जनों ट्रेनों में नहीं लगे एंटी फॉग डिवाइस सिस्टम

Panchkula Bureauपंचकुला ब्‍यूरो Updated Sun, 25 Nov 2018 01:06 AM IST
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- चंडीगढ़ रूट की दर्जनों ट्रेनों में नहीं लगे एंटी कोलेजन डिवाइस
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- कोहरे से निपटने को इस बार भी रेलवे अंग्रेजों के जमाने की जुगाड़ टेक्नालॉजी पा निर्भर रहेगा
दीपक शाही
जीरकपुर। आज ट्राइसिटी के लोग वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन और हाई स्पीड ट्रेन के सपने देख रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि चंडीगढ़ से दिल्ली रूट पर चलने वाली वीवीआईपी ट्रेन चंडीगढ़ शताब्दी और कालका नई दिल्ली शताब्दी जैसी ट्रेनें भी अंग्रेजों के जमाने के जुगाड़ टेक्नालॉजी पर निर्भर हैं। यानी ट्रेनों को सिग्नल बताने और उसे सुरक्षित गति से ट्रैक पर गुजारने के लिए पटरियों पर पटाखे फोड़ने पड़ते हैं। क्योंकि इन ट्रेनों की प्लानिंग के बाद में एंटी कोलेजन डिवाइस नहीं लग पाया। नतीजा दिसंबर और जनवरी की धुंध में शताब्दी के यात्री भी लेट होने के लिए तैयार हो जाएं।

अधिकतर ट्रेनों के एंटी फॉग डिवाइस सिस्टम खराब
चंडीगढ़ रूट पर चलने वाली अधिकतर ट्रेनों में लगे फॉग डिवाइस सिस्टम खराब पड़े हैं। यह डिवाइस सिस्टम सिर्फ 500 से 1000 मीटर तक की विजिबिलिटी में कामयाब है। जब विजिबिलिटी 100-200 के बीच होगी तो रेलवे को पटाखों पर ही निर्भर रहना होगा। अधिकारियों की माने तो फॉग डिवाइस सिस्टम लोको पायलट को दिया जाता है, जो पायलट को यह बताता है कि आगे कौन सा सिग्नल आने वाला है। लेकिन यह भी अधिक फॉग या शून्य दृश्यता में काम करना बंद कर देता है। ऐसे में इस डिवाइस के माध्यम से सिर्फ घटनाओं पर ही कंट्रोल किया जा सकता हैं। धुंध में ट्रेनों की रफ्तार नहीं बढ़ाई जा सकती है।

सिग्नल से 500 मीटर दूरी पर जलाते हैं पटाखा
कोहरे के दौरान ट्रेनों के सफल परिचालन के लिए फॉग सिग्नल (पटाखा) का इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह ऐसा उपाय है कि घना कोहरा होने पर लोको पायलट को सिग्नल न दिखाई देने पर रेलकर्मी सिग्नल से 500 मीटर पहले रेललाइन पर पटाखा जलाते हैं, जिससे लोको पायलट को पता चल जाए कि आगे कोई खतरा है या सिग्नल आने वाला है। इस पटाखे की आवाज के साथ ही लोको पायलट सावधान हो जाता है और उसी के मुताबिक ट्रेन को सावधानी से ट्रेन को आगे बढ़ाता है।

2010 में एफएसडी सिस्टम ट्रेनों में लगाए गए थे
रेलवे ने वर्ष 2010 के दौरान फॉग सेफ्टी डिवाइस (एफएसडी) का परीक्षण शुरू किया। एक-दो साल परीक्षण में ही निकल गए। 2014 में रेलवे ने 350 ट्रेनों में एफएसडी (धुंध से बचाव की प्रणाली) लगाने का फैसला किया। ट्रेनों में जो थोड़े-बहुत एफएसडी लगाए भी गए उनमें खामियां आने लगी हैं।

क्या है एफएसडी
एफएसडी यानी फॉग सेफ्टी डिवाइस वॉकी-टॉकी जैसी साधारण ऑडियो प्रणाली है। जब कोई सिगनल या स्टेशन आने वाला हो तो ट्रेन के ड्राइवर को वॉकी-टॉकी पर सूचना दे दी जाती है और वह ट्रेन की रफ्तार कम कर देता है।

एंटी-कोलेजन डिवाइस
यह एक अलार्म है जो ट्रेन ड्राइवर के केबिन में फिट किया जाता है। जब एक ही ट्रैक पर दो ट्रेन एक-दूसरे के काफी नजदीक आ जाती हैं, या फिर ट्रैक पर कुछ होता है, तो दोनों ट्रेनों के ड्राइवरों को यह अलर्ट कर देता है। यह जीपीएस (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) पर आधारित होता है।
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