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Stubble Burning: पंजाब में 70 साल पुरानी बीमारी, ठीक होने में वक्त लगेगा बशर्ते सरकार गंभीर हो
Sat, 05 Nov 2022 02:55 PM IST
निवेदिता वर्मा
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 05 Nov 2022 02:55 PM IST
सार
1970 के दशक से पराली जलाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। किसान नेता व विशेषज्ञ कहते हैं कि समाधान तो कई हैं लेकिन बात सरकार की गंभीरता की आती है।
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पराली जलाने के मामले।
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
1960 के दशक में पंजाब में खेती वाले इलाके का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा धान की खेती के तहत आता था। वर्तमान में खरीफ की फसल का 84 फीसदी क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। पराली जलाने की प्रक्रिया तेज और कारगर होने के चलते किसान इसके आदी हो चुके हैं। उन्हें अपनी अगली फसल को तैयार करने के लिए खेत को साफ करना होता है।
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साल में तीन-तीन फसलें उगाई जाती हैं लेकिन उनके पास समय बहुत कम होता है और ऐसे में एक-एक दिन मायने रखता है। किसान नेताओं का कहना है कि 70 साल पुरानी बीमारी है, चंद सालों में ठीक नहीं होगी, वक्त लगेगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि बॉयो गैस या ऊर्जा पैदा करने जैसे हैं काफी समाधान हैं। यह भी राय है कि पराली प्रबंधन के लिए इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पैट्रोलियम जैसी कंपनियों को आगे आना होगा।
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किसानों को अपने खेतों से हो रही आय में गिरावट दिख रही है। इसलिए वे आखिरी बूंद को निचोड़ लेना चाहते हैं। यही वजह है कि 1970 के दशक से पराली जलाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। किसान नेता व विशेषज्ञ कहते हैं कि समाधान तो कई हैं लेकिन बात सरकार की गंभीरता की आती है।
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ऐसे हो सकता है पराली का समाधान
हैप्पी सीडर व मल्चर मशीनें - हैप्पी सीडर और सुपर सीडर जैसी उन कृषि मशीनों के इस्तेमाल से पराली का समाधान हो सकता है। सरकार ने ग्रामीण स्तर पर पराली प्रबंधन के लिए इस मशीनरी की सहायता का उचित प्रबंधन किया ही नहीं। सरकार भी मानती है पूरे राज्य में मुहैया कराने के लिए पर्याप्त संख्या में हैप्पी सीडर, मल्चर नहीं हैं। ऊपर से ईंधन की लागत तेजी से बढ़ रही है और किसानों को इन मशीनों को किराए पर लेने या खरीदने से पूरी तरह से हतोत्साहित किया जाता रहा है। छोटा किसान इतनी महंगी मशीनें और ईंधन पर पैसा खर्च नहीं कर सकता।
यह कैसे संभव है ?
क्रांतिकारी किसान यूनियन के प्रधान डॉ. दर्शन पाल का कहना है कि यह संभव ही नहीं है, किसानी का धंधा फायदेमंद नहीं है। यह बड़े किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है कि वह मशीनों का इस्तेमाल करे, जिस किसान के पास 5 एकड़ से कम की जमीन है, वह क्या करेगा ? ऐसे 80 फीसदी किसान हैं जिनके पास से पांच एकड़ से कम जमीन है। कृषि-मशीनरी को खरीदना इसलिए एक मुश्किल का काम है, क्योंकि सरकार केवल कुछ मुट्ठी भर सूचीबद्ध एजेंसियों को ही सब्सिडी देती है। हैप्पी सीडर्स की 1.75 लाख रुपये की कीमत है और इसे चलाने के लिए 60 हार्स पॉवर वाले ट्रैक्टर की। छोटा किसान कैसे ले सकता है ? अगर किसान सुपर सीडर चाहते हैं, तो उन्हें एक नया उच्च शक्ति वाला ट्रैक्टर खरीदना होगा। उनके पास जितने भी कृषि उपकरण हैं, वे सभी बेकार हो जाएंगे। किसान को इन मशीनों को अपनाने से पहले खेतीबाड़ी से जुड़ी पूरी व्यवस्था को बदलना होगा। सरकार को छोटे किसानों की सहायता के लिए आगे आना होगा। जब से सरकार ने सब्सिडी का एलान किया है, 1 लाख रुपये वाले हैप्पी सीडर की कीमत बढ़कर 1.75 लाख रुपये हो चुकी है।
फसलों की विभिन्नता भी उपाय लेकिन एमएसपी से बंधे किसान
किसानों को धान की जगह मूंग, सरसों, गन्ने और सब्जियों की खेती की तरफ आगे बढ़ाना होगा, जिसमें लागत कम मुनाफा अधिक हो। किसान नेता बलवंत सिंह कहते हैं कि जैविक प्रमाणन वाले तिलहन या फलियों की फसलों को अपनाने से भी उन्हें फायदा मिल सकता है। अलग-अलग तरह की फसलों को उपजाना किसानों की जरूरत है। एमएसपी लागू होने के कारण किसान धान की खेती करने में सुरक्षित महसूस करता है। अगर सरकार बाकी फसलों व सब्जियों पर खरीद की गारंटी दे तो किसान का धान से लगाव कम होगा पराली की समस्या खत्म होगी।
पराली से कोयला व बॉयो गैस भी उपाय, लेकिन जमीनी स्तर पर सरकार फेल
थर्मल प्लांट के लिए गैसीकरण या धान की पुआल से बने कोयला बनाने जैसे समाधान भी हैं। एक छोटे प्लांट में रोजाना करीब 300 टन पराली से 200 टन कोयला और 250 टन कैटल फीड बन सकती है। पंजाब सरकार ने चेन्नई की नैवे रिन्युएबल एनर्जी (बठिंडा) प्राइवेट लिमिटेड से टाईअप किया गया था। कंपनी को 10 हजार करोड़ रुपये इन्वेस्ट कर प्लांट लगाने थे।
मशरूम की खेती फायदेमंद
पैडी स्ट्र मशरूम, ऑयस्टर आदि जैसी मशरूम की विभिन्न किस्में धान की भूसी पर अच्छी तरह से विकसित होती हैं और किसान अपने पोषण और आय को बढ़ाने के लिए इसकी खेती कर सकते हैं। लेकिन सरकार की गारंटी नहीं है कि मशरूम की फसल पूरी बिकेगी या नहीं? वहीं, पराली की संभाल के लिए तेल कंपनियां अगर पराली का समाधान करने के आगे आएं तो संभव है। क्रांतिकारी किसान यूनियन के प्रधान डॉ. दर्शन पाल का कहना है कि पराली के छोटे छोटे यूनिट तेल गैस कंपनियां अगर पंजाब में लगाती हैं तो पराली का प्रबंधन हो सकता है। इंग्लैंड की अरीका कंपनी के साथ भी बायो एथेनॉल प्लांट बनाने की योजना सरकार ने बनाई थी।अगर सरकार इस रास्ते पर चल पड़े तो पराली की समस्या अगले तीन साल में खत्म हो जाएगी।