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सावधान! देवभूमि के पहाड़ों में घूम रही 'दहशत', घरों में कैद हुए लोग
Tue, 08 Mar 2016 04:33 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 08 Mar 2016 04:33 PM IST
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार की दहशत
- फोटो : amar ujala
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों दहशत का माहौल है। आलम ये है कि खौफ के कारण लोग घरों में कैद होने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं बच्चों ने स्कूल जाना तक छोड़ दिया है। इंसान और जानवर सभी इस दहशत के शिकार बन रहे है।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार की दहशत
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राजाजी नेशनल पार्क और कार्बेट नेशनल पार्क के बीच स्थित लैंसडौन डिवीजन में बढ़ रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले बता रहे हैं कि क्षेत्र में गुलदारों की तादात एकाएक बढ़ गई है। एक कारण इस क्षेत्र में बाघों का बढ़ता मूवमेंट भी है। आरक्षित वन क्षेत्र में बाघों का मूवमेंट बढ़ने से जहां गुलदार अपना अधिवास बदलने को मजबूर हो गए हैं, वहीं हाथी के झुंड भी अपने बच्चों की खातिर बाघ वाले क्षेत्र से तलहटी वाले हिस्सों में आने लगे हैं।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार की दहशत
- फोटो : amar ujala
जानकारों का कहना है कि गढ़वाल के जंगलों में लगी आग और भोजन की कमी भी गुलदारों को लैंसडौन के जंगलों की ओर आने को मजबूर कर रहे हैं। बीते चार महीने के अंदर ही लैंसडौन वन प्रभाग में गुलदार चार मासूमों की जान ले चुका है। इसमें दो घटनाएं लालढांग रेंज में बीते नवंबर की और ताजा दो मामले लैंसडौन रेंज के जयहरीखाल क्षेत्र के हैं। जहां दो गुलदारों को पिंजड़े में कैद करने और एक को शूट करने के बाद भी गुलदारों की दहशत कम नहीं हुई है। पौखाल, द्वारीखाल, रिखणीखाल समेत कई क्षेत्रों में गुलदार देखे जा रहे हैं। वन अधिकारियों की मानें तो लैंसडौन वन प्रभाग में बाघों की संख्या 23 से 26 के बीच दर्ज की गई है। जो राजाजी नेशनल पार्क से अधिक है। ऐसे में गुलदारों का उनके क्षेत्र से बाहर भटकना स्वाभाविक है।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार की दहशत
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बाघ अपने क्षेत्र में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करता। ऐसे में निचले क्षेत्रों में गुलदार और हाथी की मूवमेंट बढ़नी स्वाभाविक है जो पिछले छह महीने में नजर आ भी रही है। जानकार लैंसडौन क्षेत्र में गुलदारों की संख्या बढ़ने का एक कारण गढ़वाल क्षेत्र के जंगलों में भोजन की कमी और आग लगना भी मान रहे हैं। अब तक कई आदमखोर गुलदारों को ठिकाने लगाने वाले प्रसिद्ध शिकारी देहरादून निवासी डॉ. प्रशांत सिंह और पौड़ी निवासी जॉय हुकिल का कहना है कि नर गुलदार की रेंज बड़ी होती है, जबकि मादा गुलदार की अपेक्षाकृत छोटी। जयहरीखाल क्षेत्र में शूट किया गया गुलदार और पिंजड़े में कैद दो गुलदार भी मादा थीं। ये गुलदार भोजन की तलाश में आबादी क्षेत्रों में आ रहे हैं।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार की दहशत
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कंडीसौड़ (टिहरी) में थौलधार ब्लॉक के ग्राम मंजरवाल गांव में एक सप्ताह से गुलदार का खौफ बना हुआ है। ग्रामीण अंधेरा होते ही अपने घरों में दुबकने को मजबूर हैं। पूर्व प्रधान गोविंद सिंह रावत ने बताया कि गुलदार अभी तक तीन गायों का शिकार कर चुका है। गुलदार के कई बार दोपहर में दिखने पर लोग खासे दहशत में हैं। सुबह के समय बच्चों का स्कूल जाना भी दूभर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि वन विभाग को कई बार गांव में पिंजरा लगाकर उसे पकड़ने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन विभाग ध्यान नहीं दे रहा है। पूर्व प्रधान ने गुलदार को पकड़ने की मांग की है।
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