Vidur Niti: महात्मा विदुर एक महान विचारक व दूरदर्शी होने के साथ साथ कुशाग्र बुद्धि वाले भी थे। महात्मा विदुर जी इतने दूरदर्शी थे कि वे समय से पहले ही आने वाली परिस्थितियों को भांपने में सक्षम थे। महाभारत के युद्ध से पहले ही विदुर जी महाराज धृतराष्ट्र को युद्ध परिणामों के बारे मे अवगत करवा दिया था। विदुर जी और महाराज धृतराष्ट्र के बीच का संवाद विदुर नीति के रूप में जाना जाता है। विदुर जी के द्वारा बताई गई बातें आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उस समय हुआ करती थी। यदि विदुर जी की नीतियों का अनुसरण जीवन में किया जाए तो कई तरह की समस्याओं से बचा जा सकता है साथ ही जीवन को सुखी बनाया जा सकता है। विदुर नीति में ज्ञानी व्यक्ति की पहचान पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। तो चलिए जानते हैं क्या होते हैं ज्ञानी मनुष्य के लक्षण इन श्लोकों के माध्यम से ।
Vidur Niti: ज्ञानी मनुष्य में होते हैं ये गुण , जानिए क्या कहती है विदुर नीति
नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् ।
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥
अर्थ-जो व्यक्ति दुर्लभ वस्तु को पाने की इच्छा नहीं रखते, नाशवान वस्तु के विषय में शोक नहीं करते तथा विपत्ति आ पड़ने पर घबराते नहीं हैं, डटकर उसका सामना करते हैं, वही ज्ञानी हैं ।
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
अर्थ-जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की ओर आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः ।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥
अर्थ-जो व्यक्ति सरदी-गरमी, अमीरी-गरीबी, प्रेम- घृणा इत्यादि विषय परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता और तटस्थ भाव से अपना राजधर्म निभाता है, वही सच्चा ज्ञानी है ।
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थ भते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥
अर्थ- ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं । किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते ।