शरीर, मन और आत्मा के संतुलित और संपूर्ण विकास की ओर हमें ले जाता है योग। इसका लक्ष्य केवल शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसका अंतिम लक्ष्य है - ईश्वर के साथ मिलन।
पश्चिमी देशों में पहली बार योग के संदेश को संगठित रूप में पहुंचाने में योगदा सत्संग सोसाइटी के संस्थापक परमहंस योगानंद का नाम निर्विवाद रूप से लिया जा सकता है। 1920 में वे 27 वर्ष की उम्र में पहली बार अमेरिका गए और तभी से योग विज्ञान के प्रचार - प्रसार में लग गए। उनके योगदान के कारण वे पश्चिम में योग के जनक भी कहे जाते हैं। वे ताउम्र सक्रिय रहे और योग की शिक्षा देते रहे।
कई तरह की उक्तियां जैसे- मैं इस संसार रूपी नाटक का एक हिस्सा हूं,परंतु इससे अलग भी हूं। अभी प्रत्येक पल को पूरी तरह से जियो और भविष्य अपने आप संवर जाएगा, परमहंस योगानंद जी की आध्यात्मिक शिक्षाओं का हिस्सा है। इस तरह की प्रभावशाली शिक्षाओं के जरिए उन्होंने लोगों को खुद में सुधार लाने के लिए प्रेरित किया। लाखों भक्त उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं। इन शिक्षाओं ने लोगों के मन और आत्मा पर अनोखी और अमिट छाप छोड़ी है।
कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने शिकागो सर्वधर्म सभा में पहली बार भारतीय धर्म का परिचय दिया, जिसका लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब भी स्वामी विवेकानंद की बात होती है तो शिकागो की धर्मसंसद में 1893 में उनके दिए गए भाषण का उल्लेख जरूर होता है। यह सही है कि स्वामी विवेकानंद ने हिंदू या भारतीय धर्म के बारे में छाए अज्ञान को दूर किया लेकिन स्वामी योगानंद ने 1920 से शुरू कर धर्म के व्यावहारिक प्रयोग के साथ योग को कक्षा और पाठ्यक्रम की तरह भी लोगों तक पहुंचाया।इस योग विज्ञान को सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक पत्राचार पाठ्यक्रमों के जरिए पहुंचाया और लोगों को शिक्षित करने के साथ ही उसका अभ्यास भी कराया।
स्वामी जी ने कई तरह से व्यक्त किया कि योग का अर्थ ईश्वर से मिलना या जुड़ना है। उनकी शिक्षाएं मूलत: सिखाती हैं कि किस प्रकार हर कोई व्यक्ति इसे पा सकता है। उन्होंने आधुनिक युग के लोगों के सामने योग का वैज्ञानिक स्वरूप व्यक्त किया। क्रिया योग विज्ञान के रूप में ध्यान की एक ऐसी प्रविधि को रखा, जिसका जिक्र श्रीकृष्ण ने गीता में किया है। आधुनिक युग में योगानंद ने उसी का प्रचार किया और लोगों को सिखाया।
अपनी आत्मकथा'योगी कथामृत ' में शरीर, मन व आत्मा के सुसंगत विकास के लिए उन्होंने क्रिया योग प्रविधि की मुख्य विशेषताओं का वर्णन किया है। मनमोहक शैली में लिखी गई इस पुस्तक में ऐसे वैश्विक सत्य हैं,जो हर युग, हर राष्ट्र,हर पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति के लिए उपयुक्त हैं। परमहंस योगानंद द्वारा बताई गई ध्यान की इन प्रविधियों का पूरी श्रद्धा और नियम से अभ्यास कर साधक उस आत्म साक्षात्कार के योग्य हो जाता है, जिसकी चर्चा संसार के सभी मुख्य धर्मों में की गई है। योगानंद जी ने शरीर , मन और आत्मा के संतुलित विकास पर बल दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुछ शारीरिक व्यायाम केवल योग नहीं हैं, अपितु इसका अंतिम लक्ष्य है - ईश्वर के साथ मिलना।