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सफला एकादशी 2019: जीवन को सफल बनाने वाली सफला एकादशी की कथा

Sun, 22 Dec 2019 06:48 AM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: योगेश जोशी Updated Sun, 22 Dec 2019 06:48 AM IST
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safla ekadashi 2019 story

पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष 22 दिसंबर को सफला एकादशी का व्रत है। भगवान विष्णु ने जनकल्याण के लिए अपने शरीर से पुरुषोत्तम मास की एकादशियों सहित कुल 26 एकादशियों को उत्पन्न किया। गीता में भी परमेश्वर श्री कृष्ण ने इस तिथि को अपने ही समान बलशाली बताया है। 

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lord vishnu

पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व समझाते हुए कहा है कि-''जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्री विष्णु तथा मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं ,उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। सभी एकादशियों में नारायण के समान ही फल देने का सामर्थ्य है। इनकी पूजा-आराधना करने वाले को किसी और पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी मनोरथों की पूर्ती कर उन्हें विष्णुलोक पहुंचाती हैं। 

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vishnu - फोटो : vishnu

इनमें सफला एकादशी तो अपने नाम के अनुसार ही सभी कार्यों को सफल एवं पूर्ण करने वाली है। पुराणों में इस एकादशी के सन्दर्भ में कहा गया है कि हज़ारों वर्ष तक तपस्या करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है वह पुण्य भक्तिपूर्वक रात्रि जागरण सहित सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। इस दिन दीपदान करने का भी बहुत महत्त्व बताया गया है। साधक को इस दिन व्रती रहकर भगवान विष्णु की मूर्ति को 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए स्नान आदि कराकर वस्त्र,चन्दन,जनेऊ,गंध,अक्षत,पुष्प,धूप-दीप,नैवैद्य,ऋतुफल,पान,नारियल आदि अर्पित करके कर्पूर से आरती उतारनी चाहिए ।  

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vishnu - फोटो : vishnu

कथा 

  • पुराणों के अनुसार राजा माहिष्मत का ज्येष्ठ पुत्र सदैव पाप कार्यों में लीन रहकर देवी-देवताओं की निंदा किया करता था। पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा ने उसका नाम 'लुम्भक' रख दिया और उसे अपने राज्य से निकाल दिया। पाप बुद्धि लुम्भक वन में प्रतिदिन मांस तथा फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। उस दुष्ट का विश्राम स्थान बहुत पुराने पीपल वृक्ष के पास था। पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह शीत के कारण निष्प्राण सा हो गया।  अगले दिन सफला एकादशी को दोपहर में सूर्य देव के ताप के प्रभाव से  उसे होश आया।  भूख से दुर्बल लुम्भक जब फल एकत्रित करके लाया तो सूर्य अस्त हो गया। तब उसने वही पीपल के वृक्ष की  जड़ में फलों को निवेदन करते हुए कहा- 'इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों'। अनायास ही लुम्भक से इस व्रत का पालन हो गया  जिसके प्रभाव से लुम्भक को दिव्य रूप,राज्य,पुत्र आदि सभी प्राप्त हुए ।
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