इस्लाम धर्म में रमजान माह का खास महत्व होता है। मान्यता है कि इस माह में आसमान से पवित्र किताब कुरान शरीफ को धरती पर लाया गया था। इस महीने को कुरान के जश्न का महीना भी कहा जाता है। इस महीने में लोग खुदा की इबादत के लिए एक महीने का रोजा रखते हैं। जो लोग इस महीने में कुरान पढ़ते है उसका विशेष महत्व होता है। तो वहीं कुछ लोग इस महीने में जरूरतमंदों को दान भी देते है। जिसका फल उन्हें दोगुना मिलता है।
इस्लाम के जानकार और मोलाना याहया करीमी का कहना है कि रमजान का महीना सब्र व सुकून का है। इस दौरान अल्लाह की खास रहमतें बरसती हैं। अल्लाह ने कुरान शरीफ में कई जगह रोजा रखने को जरूरी बताया है।
रोजे का इतिहास
अल्लाह के हुक्म से सन 2 हिजरी से मुसलमानों पर रोजे अनिवार्य किए गए। इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि रमजान में शब-ए-कद्र के दौरान अल्लाह ने कुरान जैसी नेमत किताब दी। रमजान में जकात (दान) का खास महत्व है। किसी के पास अगर सालभर उसकी जरूरत से ज्यादा साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर की नकदी या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात यानी दान के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाना चाहिए।
रोजे के मायने
रोजा को अरबी भाषा में सौम कहा जाता है। सौम का मतलब होता है रुकना, ठहरना यानी खुद पर नियंत्रण या काबू करना। यह वो महीना है, जब हम भूख को शिद्दत से महसूस करते हैं और सोचते हैं कि एक गरीब इंसान भूख लगने पर कैसा महसूस करता होगा। बीमार इंसान, जो दौलत होते हुए भी कुछ खा नहीं सकता, उसकी बेबसी को महसूस करते हैं।
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- फोटो : rajeev gupta/ amarujala
रमजान के महीने में रोजा रखने पर यह तर्क दिया जाता है कि इस महीना में लोग खुद को बुरी आदतों से दूर रखते हैं। रोजा हमें सिखाता है कि हमें कोई भी गलत काम नहीं करना चाहिए।