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Pitru Paksha 2022: श्राद्ध पक्ष 10 से 25 सितंबर तक, श्राद्ध में 5 मुख्य कर्म अवश्य करने चाहिए

Sun, 04 Sep 2022 07:06 AM IST
विनोद शुक्ला मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़
मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़ Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 04 Sep 2022 07:06 AM IST
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Pitru Paksha 2022 Starting Date Know The Importance And Pitru Paksha Worship Method
pitru paksha 2022: पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है। - फोटो : अमर उजाला

Pitru Paksha 2022: हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। 

Pitru Paksha 2022 Starting Date Know The Importance And Pitru Paksha Worship Method
- फोटो : अमर उजाला

ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

श्राद्ध में तिल,चावल जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र,भाई,पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है।

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श्राद्ध में कौओं का महत्त्व
कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है।

पितृ दोष में अवश्य करें श्राद्ध     
मान्यता है कि यदि ज्योतिषीय दृष्टि से कुंडली में पितृ दोष है तो निम्न परिणाम देखने को मिलते हैं।
1-संतान न होना
2-धन हानि 
3-गृह क्लेश
4-दरिद्रता
5-मुकदमे
6-कन्या का विवाह न होना 
7-घर में हर समय बीमारी
8-नुकसान होना
9- धोखे
10-दुर्घटनाएं
11- शुभ कार्यों में विघ्न
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कैसे करें श्राद्ध और सामग्री
इसे ब्राह्राण या किसी सुयोग्य कर्मकांडी द्वारा करवाया जा सकता है। आप स्वयं भी कर सकते हैं।  ये सामग्री ले लें सर्प-सर्पिनी का जोड़ा,चावल,कालेतिल,सफेद वस्त्र,11 सुपारी,दूध,जल, तथा माला। पूर्व या दक्षिण की ओर मुंह करके बैठें। सफेद कपड़े पर सामग्री रखें। 108 बार माला से जाप करें या सुख शांति,समद्धि प्रदान करने तथा संकट दूर करने  की क्षमायाचना सहित पित्तरों से प्रार्थना करें। जल में तिल डालके 7 बार अंजलि दें। शेष सामग्री को पोटली में बांध के प्रवाहित कर दें।  हलुवा,खीर,भोजन,ब्राहमण,निर्धन,गाय,कुत्ते,पक्षी को दें। 


श्राद्ध के 5 मुख्य कर्म अवश्य करने चाहिए। 
1- तर्पण-दूध,तिल,कुशा,पुष्प,सुगंधित जल पित्तरों को नित्य अर्पित करें।
2- पिंडदान-चावल या जौ के पिंडदान,करके भूखों को भोजन भेाजन दें।
3- वस्त्रदानः निर्धनों को वस्त्र दें। 
4- दक्षिणाः भोजन के बाद दक्षिणा दिए बिना एवं चरण स्पर्श बिना फल नहीं मिलता।
5- पूर्वजों के नाम पर कोई भी सामाजिक कृत्य जैसे -शिक्षा दान,रक्त दान,भोजन दान,वृक्षारोपण ,चिकित्सा संबंधी दान आदि अवश्य करना चाहिए।

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किस तिथि को करें श्राद्ध ?
जिस तिथि को जिसका निधन हुआ हो उसी दिन श्राद्ध  किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु प्रतिपदा को हुई है तो उसी तिथि के दिन श्रद्धा से याद किया जाना चाहिए । यदि देहावसान की डेट नहीं मालूम तो फिर भी कुछ सरल नियम बनाए गए हैं। पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का नवमी पर किया जाना चाहिए। जिनकी मृत्यु दुर्घटना, आत्मघात या अचानक हुई हो ,उनका चतुदर्शी का दिन नियत है। साधु-सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर होगा। जिनके बारे कुछ मालूम नहीं ,उनका श्राद्ध अंतिम दिन अमावस पर किया जाता है जिसे सर्वपितृ श्राद्ध कहते हैं। 

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