भगवान शिव के प्रति लोगों की गहरी आस्था है, लोग अपने आसपास ही नहीं बल्कि दूर-दराज के शहरों के मंदिरों में भी दर्शन करने जाते हैं। आज महाशिवरात्रि है और आज का दिन भगवान शिव को समर्पित होता है। लोग आज के दिन भोलेनाथ की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दिनभर भगवान शिव की भक्ति में खोए रहते हैं। वहीं, लोग मंदिरो में भी जाते हैं और वहां जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। इसी तरह खजुराहो का मतंगेश्वर मंदिर भी लोगों की आस्था का केंद्र है, जो भगवान शिव का मंदिर है। तो चलिए जानते हैं इस बारे में।
2 of 5
Matangeshwar Temple
- फोटो : istock
दरअसल, खजुराहो का मतंगेश्वर मंदिर एक हजार साल पुराना है और ये बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण एक हजार साल पहले चंदेल के राजा ने 9वीं शताब्दी में करवाया था। पश्चिम मंदिर समूह के बाजू में स्थित इस विशाल मंदिर के गर्भगृह में लगभग छह फीट ऊंची जलहरी के ऊपर 9 फीट ऊंचा शिवलिंग है। इस शिवलिंग की खासियत है कि ये शिवलिंग जितना ही ऊपर है, उतना ही ये आकार में नीचे भी है।
3 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : istock
मान्यता है कि इस मंदिर में मौजूद मणि के कारण जो लोग यहां आकर अपने मन की मनोकामना मांगते हैं, उनकी इच्छा जरूर पूरी होती है। अमूमन मंदिरों में भगवान शिव को जल चढ़ाने के लिए ज्यादा ऊपर नहीं जाना पड़ता, लेकिन यहां श्रद्धालुओं को शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए छह फीट ऊंची जलहरी पर चढ़ना पड़ता है।
4 of 5
Matangeshwar Temple
- फोटो : istock
वैसे तो इस मंदिर में भक्तों की आस्था काफी ज्यादा है, जिसके चलते हर वक्त यहां काफी भीड़ रहती है, लेकिन महाशिवरात्रि, मकर संक्रांति और अमावस्या के मौके पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और भगवान शिव से अपनी मनोकामना मांगते हैं। यही नहीं, मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर भी भक्त यहां पहुंचकर भोलेनाथ से आशीर्वाद लेते हैं।
5 of 5
Matangeshwar Temple
- फोटो : istock
बात अगर इस मंदिर निर्माण की प्रचलित कथा के बारे में करें, तो मान्यताओं के अनुसार इस मतंगेश्वर मंदिर का निर्माण एक विशेष मणि रत्न के ऊपर कराया गया है। इसको लेकर कहा जाता है कि इस मणि को खुद भगवान शिव ने सम्राट युधिष्ठिर को दी थी। ये मणि ऐसी है कि जो हर मनोकामना को पूरी करती थी। वहीं, बाद में युधिष्ठिर ने इस मणि को मतंग ऋषि को दान कर दिया था। इसके बाद ये मणि मतंग ऋषि के पास से मणि बुंदेलखंड के चंदेल राजा हर्षवर्मन के पास आ गई, और राजा हर्षवर्मन ने मणि को धरती के नीचे दबाकर उसी स्थान पर मतंगेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।