भगवान शिव ऐसे देव हैं जो श्रद्धा भक्ति के साथ की गई थोड़ी सी पूजा से तुरंत प्रसन्न हो जाते है और जिनकी पूजा-आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। भगवान शिव का श्रृंगार अन्य देवताओं की तुलना में सबसे निराला है, जो अपनी अलग-अलग प्रकृति को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवजी के हर आभूषण का विशेष प्रभाव तथा महत्व बताया गया है।
Maha Shivratri 2020: शिव भक्त जरूर जानें शिव श्रृंगार के इन प्रतीकों को...
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शीश पर गंगा
गंगा को शंकर जी का प्रथम शृंगार माना गया है। शिवजी के गांगेय, गंगेश्वर, गंगाधिपति, गंगेश्वरनाथ आदि नाम पुनीत गंगा को धारण करने के कारण ही हैं। पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए जब गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर लाया गया, तो पृथ्वी की क्षमता गंगा के आवेग को सहने में असमर्थ थी, ऐसे में सदाशिव ने अपनी जटाओं में गंगा को स्थान देकर यह सन्देश दिया कि आवेग की अवस्था को दृढ़ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है।
सुशोभित है चन्द्रमा-
चन्द्रमा को शिवजी का मुकुट कहा गया है। विवरण मिलता है कि शिवजी के त्रिनेत्रों में एक सूर्य, एक अग्नि और एक चंद्र तत्व से निर्मित है। चंद्र आभा, प्रज्जवल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है,जो मन के शुभ विचारों के माध्यम से उत्पन्न होते हैं। ऐसी अवस्था में प्राणी को अपने यथा योग्य श्रेष्ठ विचारों को पल्ल्वित करते हुए सृष्टि के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। चंद्रमा का एक नाम 'सोम' है, जो शांति का प्रतीक है। इसी हेतु सोमवार शिवपूजन, दर्शन और उपासना का दिन माना गया है।
त्रिशूल-
शिवजी के श्रृंगार में त्रिशूल का विशिष्ट स्थान है। त्रिशूल के तीन शूल क्रमशः सत, रज और तम गुण से प्रभावित भूत,भविष्य और वर्तमान का द्योतक हैं। त्रिशूल के माध्यम से युग-युगांतर में सृष्टि के विरुद्ध सोचने वाले राक्षसों का संहार किया है।
शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म से नश्वरता का स्मरण होता है। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, केवल भस्म (राख) शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है। वेद में रुद्र को अग्नि का प्रतीक माना गया है। अग्नि का कार्य भस्म करना है अत: भस्म को शिव का श्रृंगार माना गया है।