केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के मध्य में स्थित है पद्मनाभ स्वामी का मंदिर। विशाल किले की तरह दिखने वाला यह मंदिर विष्णु भक्तों के लिए महत्वपूर्ण आस्था स्थल है। यहां भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। महाभारत के अनुसार श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा-अर्चना की थी।
Padmanabha temple : दुनिया का सबसे अमीर मंदिर, जहां दीयों की रोशनी में होते हैं भगवान के दर्शन
यहां भक्तों को अलग-अलग दरवाजों में से भगवान विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा के दिव्य दर्शन करने को मिलते हैं। इस मूर्ति में शेषनाग के मुंह इस तरह खुले हुए हैं, जैसे शेषनाग भगवान विष्णु के हाथ में लगे कमल को सूंघ रहे हों। मूर्ति के आसपास भगवान विष्णु की दोनों रानियों श्रीदेवी और भूदेवी की मूर्तियां स्थापित हैं। इस मूर्ति में भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर जगत पिता ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित है। मुख्य कक्ष जहां विष्णु भगवान की लेटी हुई मुद्रा में प्रतिमा है, वहां कई दीपक जलते रहते है, इन्ही दीपकों के उजाले से भगवान के भव्य दर्शन होते हैं।
यह मंदिर दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में गिना जाता है। कुछ वर्ष पहले विष्णु जी के इस मंदिर में पांच तहखानों में से एक लाख करोड़ से भी ज़्यादा की संपत्ति का पता चला है। आज भी इस अकूत संपत्ति की देखभाल त्रावणकोर राजपरिवार करता है।
मंदिर में अत्यंत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ यहां श्रद्धालुओं के प्रवेश के नियम भी हैं। पुरुष केवल धोती(मुंडु) पहन कर ही प्रवेश कर सकते हैं और महिलाओं के लिए साडी पहनना अनिवार्य है। अन्य किसी भी लिबास में प्रवेश यहां वर्जित है।
राजधानी तिरुवनंतपुरम को यह नाम भगवान विष्णु के अनंत फन वाले नाग के कारण ही मिला है। मंदिर में एक स्वर्ण स्तंभ बना हुआ है, जिसकी सुंदरता को श्रद्धालु एकटक निहारते रहते हैं। मंदिर का स्वर्ण जड़ित गोपुरम सात मंज़िल का, 35 मीटर ऊंचा है। कई एकड़ में फैले मंदिर में महीन कारीगरी का भी कमाल देखते ही बनता है। मंदिर के बाहर पवित्र सरोवर है जिसे पद्मनाभ तीर्थ कहते हैं।
श्री पद्मनाभ मंदिर की एक विशेषता है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा, बैठी हुई और खड़ी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। सभी मूर्तियों की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। तीनों मूर्तियों की पूजा अलग-अलग तरीके से की जाती है। गर्भगृह में भगवान विष्णु की शयनमुद्रा में मूर्ति का शृंगार फूलों से किया जाता है। पूजा के समय इन फूलों को मोर पंखों से हटा दिया जाता है। फिर मूर्ति को स्नान कराया जाता है। भगवान विष्णु की खड़ी मूर्ति को उत्सवों के अवसर पर मंदिर से बाहर ले जाते हैं। प्रतिवर्ष मार्च-अप्रैल और अगस्त-नवंबर महीनों में वर्ष में दो बार धार्मिक समारोह होता है। इस समारोह में ‘आउत’ (पवित्र स्नान) किया जाता है। इस समारोह में भगवान विष्णु, नरसिंह और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियों को नगर के बाहर समुद्र किनारे पर ले जाकर स्नान कराया जाता है।