होली पर आप रंग तो खेलती ही हैं। लेकिन अगर आप अपनी राशि के अनुसार रंगों और फूलों का चयन कर रंग-बिरंगी या फूलों की होली खेलें, तो आप न केवल पूरे उल्लास से रंगों के त्योहार को मनाएंगी, बल्कि इससे आपके रिश्ते भी मजबूत होंगे।
होलिकोत्सव सूर्य सिद्धां की गणना के अनुसार होने की वजह से वर्ष की समाप्ति का द्योतक है। इसी पूर्णिमा को श्रीविष्णु रूप भगवान नरसिंह का अवतरण हुआ था। मौसम की दृष्टि से इस त्योहार का बड़ा महत्व है। हेमंत ऋतु की समाप्ति तथा पतझड़ के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता है। इस वसंत ऋतु में प्रकृति का मनोहारी रूप सामने आता है। बाग-बगीचे नए-नए फूलों की रंगत से भर जाते हैं। पशु-पक्षियों की चहचहाट गूंजने लगती है और आम की मंजरी/बौर फूटने लगती है। लगता है, मानो प्रकृति के पूरे प्रांगण में एक नई ऊर्जा उत्पन्न हुई है। इस त्योहार पर ध्यान दें, तो तीन चीजें प्रमुख हैं- रंग, ताप और वाणी। आयुर्वेद की दृष्टि से शरद ऋतु के कारण उत्पन्न कष्टों से निपटने के लिए ये तीनों ही अत्यंत जरूरी हैं।
आयुर्वेद के अनुसार, वसंत में शीत काल का जमा हुआ कफ सूर्य की तेजस्विता से प्रेरित होकर शरीर की अग्नि को बाधित करता है। अतः अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इस कारण वमनादि संशोधक कर्म करने चाहिए। होली में मुख्यतः जल सींचना, गुलाल उड़ाना इत्यादि संचित कफ को उद्रित करने वाले हैं। आयुर्वेद के अनुसार, संचित कफ को उद्रित करके निवृत्त करना जरूरी होता है। काल विज्ञान के अनुसार भी पूर्णिमा के दिन पूर्ण चंद्रमा सोमरस प्रदान कर कफ को निकालने में सहायक होता है।
इसी प्रकार शीत ऋतु में संचित कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए मोहल्लों/गांवों/शहरों में तीव्र अग्नि के ताप की जरूरत होती है, क्योंकि शीत प्रकृति के इन कीटाणुओं को तेज गर्मी से ही नष्ट किया जा सकता है। इसके लिए गोबर के उपले तथा लकड़ियों की जरूरत होती है, ताकि अग्नि प्रज्वलन तीव्र हो सके। इससे व्यक्तियों के शरीर में स्थित तथा वातावरण में उपस्थित कफ जनित कीटाणुओं का नाश हो सके। इसके साथ ही खूब जोर लगाकर हंसना, गाना तथा बोलना भी चिकित्सा का ही अंग है। इनके द्वारा गले का व्यायाम होता है। गले के व्यायाम से नाक-कान-गले की तकलीफ और कफजन्य कष्ट दूर होते हैं।
आयुर्वेद और रंग व संगीत चिकित्सा के अनुसार, इस समय लाल, पीले, नारंगी और हरे रंगों का तीव्र प्रभाव होता है। इसका प्रभाव होलिका दहन की लाल, पीली लपटों, गुलाल के रंगों तथा फूलों में देखा जा सकता है। इन रंगों के सकारात्मक प्रभाव को समझना जरूरी है। वैज्ञानिक स्तर पर रंगों से लाभ पर लंबे समय से शोध चल रहे हैं। ऐसे ही एक शोध के अनुसार, रोशनी हमारे शरीर को आंखों द्वारा भेदकर पिट्यूटरी ग्लैंड को उत्तेजित करती है। इसके परिणामस्वरूप कुछ खास हार्मोन्स का स्राव होता है। यह शरीर द्वारा रंगों के लिए होने वाली प्रतिक्रिया है। हम राशि के अनुसार रंगों और फूलों का चुनाव कर रंग-बिरंगी अथवा फूलों की होली खेल सकते हैं।