श्रुति दीक्षा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विघ्नहर्ता श्री गणेश का अवतरण भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। यह शुभ दिन कालांतर में गणेश चतुर्थी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाराष्ट्र के गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज (1630–1680) के काल में यह पर्व एक सार्वजनिक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले इस उत्सव ने सामाजिकता को एक नया रूप दिया है।
महान समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को न केवल धार्मिक भावनाओं के उत्सव के रूप में देखा, बल्कि ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के विरुद्ध एक सांस्कृतिक एकता के शंखनाद रूप में इस दस दिवसीय आराधना को जन-जन तक पहुंचाया। उनके लिए इस आयोजन का उद्देश्य था- समाज में व्याप्त जातीय भेद मिटाकर ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण समुदायों को एक सूत्र में पिरोना और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करना।
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Ganesh Utsav 2025
- फोटो : Adobe stock
समय के साथ यह पर्व केवल धार्मिक न होकर, सामाजिक समरसता का उत्सव बन गया। बप्पा अब केवल एक धर्म के नहीं, सर्वसमाज के आराध्य हो गए। उनकी विशाल प्रतिमाओं का निर्माण और सजावट अनेक मुस्लिम कलाकारों के श्रम से संपन्न होती है। विशेषकर मुंबई में गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक इस उत्सव का रंग इतना गाढ़ा होता है कि हर धर्म, जाति, वर्ग के लोग इसमें तन-मन से सम्मिलित होते हैं। दस दिवसीय इस पर्व में जब अबीर-गुलाल हवाओं में उड़ता है, तो मानो आसमान भी गणपति के रंग में रंग जाता है।
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गली-गली में गूंजते ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष, नाचते-गाते भक्तों के बीच ढोल-नगाड़ों की थाप और श्रद्धा से सराबोर जनसमुदाय - यह दृश्य किसी आध्यात्मिक उत्सव से कम नहीं होता। लालबाग के राजा की भव्य प्रतिमा के दर्शन हेतु देश-विदेश से श्रद्धालु मुंबई की ओर खिंचे चले आते हैं। सड़कों के किनारे मानो भारत के हर कोने की सांस्कृतिक बगिया सज जाती है - मिट्टी की सौंधी खुशबू जैसे नगर के कण-कण में समा जाती है।
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इस पर्व की सबसे अनुपम छवि तब उभरती है, जब मुस्लिम परिवार भी हिंदू परिवारों के साथ मिलकर बप्पा का स्वागत करते हैं, रात्रि जागरण में भाग लेते हैं और पंडालों में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। मुंबई के वर्ली क्षेत्र में श्री गणेश सेवा मंडल बीते सौ वर्षों से यह परंपरा निभा रहा है, जिसमें सभी समुदाय के लोग भी पूरे श्रद्धाभाव से गणपति की स्थापना में भाग लेते हैं। विसर्जन के समय लोग श्रद्धालुओं को जल पिलाते हैं, प्रसाद बांटते हैं - यह दृश्य केवल एक त्योहार नहीं, सांझा संस्कृति की जीवंत मिसाल है।
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यह पर्व अब केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। देश के हर हिस्से में ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष लगता है। धर्म और जाति की सीमाएं विलीन हो जाती हैं, बस एक भारत का स्पंदन रह जाता है। वास्तव में यही है भारतीय संस्कृति की वह अनुपम छवि, जो अनेकता में एकता की भावना को उजागर करती है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।