Dhanteras 2021: कैसे बना भोजन चुराने वाला एक गरीब ब्राह्मण, देवताओं का धन कोषाध्यक्ष कुबेर
धनतेरस का त्योहार 2 नवंबर 2021, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन माता लक्ष्मी भगवान धनवंतरि के साथ- साथ धन के देवता कुबेर की भी पूजा की जाती है। यक्षों के राजा कुबेर धन के स्वामी हैं और उत्तर दिशा के दिकपाल हैं। कुबेर को संसार के रक्षक लोकपाल भी माना जाता है। इतना ही नहीं कुबेर रावण, कुंभकर्ण और विभीषण के सौतेले भाई हैं, लेकिन ब्राह्मण गुणों के कारण कुबेर को देवता बनाए गया। धन के देवता कुबेर को भगवान शिव का द्वारपाल भी बताया जाता है।
कुबेर सुख-समृद्धि और धन देने वाले देवता हैं। उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष माना गया है। मान्यता है कि कुबेर देवता की मूर्ति घर में लाने से सदैव परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। कुबेर देवता का निवास उत्तर दिशा की ओर माना गया है। पर क्या आप जानते हैं भोजन चुराने वाला एक गरीब ब्राह्मण कैसे बना देवताओं के कोषाध्यक्ष। तो आइए आज आपको इसे जुड़ी एक पौराणिक कथा बताते हैं-
कौन थे भगवान कुबेर पिछले जन्म में
भगवान कुबेर पूर्वजन्म में एक गुणनिधि नाम के गरीब ब्राह्मण थे। बचपन में उन्होंने अपने पिता से धर्म शास्त्र की शिक्षा ली। लेकिन गलत संगत में आने के कारण उन्हें जुआ खेलने और चोरी की लत लग गई। गुणनिधि की इन हरकतों से परेशान होकर उनके पिता ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद उनकी हालत दयनीय हो गई और वह लोगों के घर जाकर भोजन मांगने लगे। एक दिन गुणनिधि भोजन की तलाश में गांव- गांव भटक रहे थे। लेकिन उन्हें उस दिन किसी ने भोजन नहीं दिया। इसके बाद गुणनिधि भूख और प्यास से परेशान हो गए। भूख और प्यास के कारण गुणनिधि भटकते-भटकते जंगल की और निकल पड़े। जंगल में उन्हें कुछ ब्राह्मण भोग की सामग्री ले जाते हुए दिखाई दिए। भूख की सामग्री को देख गुणनिधि की भूख और भी ज्यादा बढ गई और खाने के लालच में वह ब्राह्मणों के पीछे- पीछे चल दिए। ब्राह्मणों का पीछा करते- करते गुणनिधि एक शिवालय आ पहुंचे। जहां उन्होंने देखा की ब्राह्मण भगवान शिव की पूजा कर रहे थे और भगवान शिव को भोग अर्पित कर भजन कीर्तन में मग्न हो गए। गुणनिधि शिवालय में भोजन चुराने की ताक में बैठे हुए थे।
रात में चुराया भोजन
उन्हें भोजन चुराने का मौका रात में तब मिला। जब भजन कीर्तन समाप्त कर सभी ब्राह्मण सो गए थे। गुणनिधि दबें पांव भगवान शिव की प्रतिमा के पास जा पहुंचे । लेकिन वहां पर इतना अंधेरा था कि उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। इसलिए उन्होंने एक दीपक जलाया। लेकिन वह दीपक हवा के कारण बुझ गया और यह क्रम बार-बार चलता रहा। जब यह क्रम कई बार चला, तो भोले-भाले और औघड़दानी शंकर ने इसे अपनी दीपाराधना समझ लिया और प्रसन्न होकर गुणनिधि को धनपति होने का आशीष दे डाला।
अनजाने में हुआ महाशिवरात्रि व्रत का पालन
गुणनिधि भूख से इतने व्याकुल थे कि भोजन चुराकर भागते समय ही उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन अनजाने में उनसे महाशिवरात्रि के व्रत का पालन हो गया था। जिसके कारण वह उस व्रत के शुभ फल के हकदार बन गए थे। अनजाने में महाशिवरात्रि के व्रत का पालन हो जाने की वजह से गुणनिधि अपने अगले जन्म में कलिंग देश के राजा बने। अपने इस जन्म में भी गुणनिधि भगवान शिव के परम भक्त हुए थे। वह सदैव भगवान शिव की भक्ति में खोए रहते थे। उनकी इस कठिन तपस्या और भक्ति को देखकर भगवान शिव उन पर प्रसन्न हुए। यह भगवान शिव की ही माया थी। जिसके कारण एक गरीब ब्राह्मण धन के देवता कुबेर कहलाए और संसार में पूजनीय बन गए।