‘शिव की महान रात्रि’, महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के आध्यात्मिक उत्सवों की सूची में सबसे महत्वपूर्ण है। सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है। तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदरम कहा जाता है। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है...महाशिवरात्रि... कानपुर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं.मनोज कुमार द्विवेदी बता रहे हैं कि यह रात इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और हम इसका लाभ कैसे उठा सकते हैं।............
Mahashivratri 2025: देवों के देव महादेव की आराधना का महापर्व
‘शिव की महान रात्रि’, महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के आध्यात्मिक उत्सवों की सूची में सबसे महत्वपूर्ण है। सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है। तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदरम कहा जाता है।
महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि का महापर्व स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है। महाशिवरात्रि के उपवास के भी कुछ नियम हैं। कुछ श्रद्धालु निर्जला उपवास रखते हैं, तो कुछ फलाहार करते हैं। वैसे उपवास में फल और जल का मिश्रण होना चाहिए, यानी यदि आपको प्यास लग रही है तो आपको जल का सेवन करना चाहिए और यदि आपको भूख है तो आपको फल का सेवन करना चाहिए। महाशिवरात्रि पर ध्यान और उपवास एक साथ करने से हमारी इच्छाएं फलित होने लगती हैं।
ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि व्रत का पालन पूरी निष्ठा से करता है, भगवान शिव की कृपा उस पर बरसती है और उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है कि हम परमात्मा शिव से बुद्धि योग लगाकर उनके समीप रहे। उपवास का अर्थ ही है समीप रहना। जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुंभकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है।
भगवान शिव का व्यक्तित्व एवं स्वरूप समग्रता का प्रतीक है यह उनके जीवन का वह दर्शन प्रदान करता है, जो मनुष्य को उसके व्यक्तित्व के उच्चतम शिखर तक ले जाता है | भगवान शिव का यह चरित्र मानवीय जीवन के उच्चतम आदर्शों की पराकाष्ठा है। महादेव गृहस्थ भी हैं और वीतरागी आदियोगी भी, उनका यह गुण संदेश देता है कि योग के मार्ग पर चलने के लिए ,ईश्वर की भक्ति के लिए संसार त्याग आवश्यक नहीं है। त्याग तो स्वयं की दुष्प्रवृत्तियों का, आसत्ति व अहंकार का करना चाहिए, ताकि अंतःकरण को योग के अनुकूल बनाया जा सके ।
कैलाशवासी भगवान शिव एक ओर तो परम पवित्र हिमालय में तपस्या में लीन रहते हैं तो दूसरी ओर भूतगणों के साथ श्मशान में निवास करते भी माने जाते हैं। इसका व्यावहारिक आशय यह है कि पवित्र और श्रेष्ठ के संपर्क में रहना श्रेयकर है, किंतु घृणित और पापी किसी को नहीं समझा जाना चाहिए। सब परमात्मा की ही संतान हैं एवं वे स्वयं सबको बराबर स्नेह करते हैं। शिव यहां सम्यक दृष्टि व मैत्री की शिक्षा देते हैं। इनके अतिरिक्त अनेकानेक विरोधाभासों का अति सुंदर समन्वय भगवान शिव के जीवन में देखने को मिलता है एक ओर वे परम कल्याणकारी, भोले, भंडारी हैं तो दूसरी ओर तांडव करने वाले महारुद्र भी, उन्हीं की भांति मनुष्य को भी श्रेष्ठ का संरक्षक व अनिति का संहारक होना चाहिए ।
शुभ व सत्य के प्रति संवेदनशील व अशुभ के प्रति कठोर होना चाहिए पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका ना तो आदि था और न अंत। बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।
शिव और शक्ति का हुआ था मिलन
महाशिवरात्रि को पूरी रात शिवभक्त अपने आराध्य जागरण करते हैं। शिवभक्त इस दिन शिवजी की शादी का उत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव जो वैरागी थी, वह गृहस्थ बन गए। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है। इसलिए महाशिवरात्रि हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों एवं भगवान शिव के उपासकों का एक मुख्य त्योहार है।
ऐसा भी माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने, व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं एवं उपासक के हृदय को पवित्र करते हैं। मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान शिव की सेवा में दान-पुण्य करने व शिव उपासना से उपासक को मोक्ष मिलता है।
महाशिवरात्रि व्रत का क्या है महत्व ?
शिवरात्रि के पर्व पर जागरण का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'महाशिवरात्रि' के व्रत का उपाय बताया |चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं।
अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभ फलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यंत शुभ कहा गया है।
भगवान शिव को कई नामों से पुकारा और पूजा जाता है। भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है। भोलेनाथ यानी जल्दी प्रसन्न होने वाले देव। भगवान शंकर की आराधना और उनको प्रसन्न करने के लिए विशेष सामग्री की जरूरत नहीं होती है। भगवान शिव जल, पत्तियां और तरह -तरह के कंद मूल को अर्पित करने से ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। शिव का अर्थ है कल्याण शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के महापर्व पर भगवान शिव की उपासना करने से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है।
भगवान शिव स्वरूप से विषम जैसे आभासित होने पर भी परम शांत, एक रूप और कृपा सागर कहलाए। अनिष्टकारक दुर्योगों में शिव की सहस्त्रनामावली, रूद्वाष्टाध्यायी, दारिद्रयदहन स्त्रोत का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र, षडाक्षर एवं पंचाक्षर का श्रद्वा व विश्वास के साथ पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। गृह जन्य की बाधा दूर हो जाती है और सभी दिव्य सुख मिलते हैं। सौभाग्य प्रदान करने वाले शिव काल के भी काल हैं और महाकाल नियन्ता है भगवान शिव परम कल्याणकारी हैं और श्रद्धा भाव से जो भी उनके दरबार में आया उसको अपना लेते हैं।
भगवान शिव को जल की धारा के साथ ही मन की धारा भी अर्पित करने से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है। शिव की पूजा में सबसे श्रेष्ठ पार्थिव पूजा है इस पूजा से रोग, शोक, पाप और दुखों का नाश होता है। श्रद्धा और समर्पण भाव से शिव की उपासना करने से शिवत्व तो जागृत होता ही है शिव तत्व की प्राप्ति भी होती है