राधा अष्टमी कल, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
राधा अष्टमी के दिन राधा रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। उदया तिथि के अनुसार, राधाष्टमी का व्रत 19 अगस्त, शनिवार के दिन मनाना शुभ होगा।
विस्तार
हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का त्योहार बड़े ही जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर राधा का प्राकट्य हुआ था। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष राधा अष्टमी 19 सितंबर 2026 को है। इस दिन व्रत रखते हुए पूरी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ राधा जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। राधा अष्टमी के दिन राधा रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और मंत्र और आरती।
राधा अष्टमी 2026 तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर को दोपहर 01 बजे शुरू हो चुकी है, जो 19 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट तक चलेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, राधाष्टमी का व्रत 19 अगस्त, शनिवार के दिन मनाना शुभ होगा।
राधाष्टमी पूजा शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, राधाष्टमी पूजन का मुहूर्त 19 अगस्त को दोपहर 11 बजकर 01 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 28 मिनट तक रहेगा।
पूजन विधि
- - राधा अष्टमी के दिन सबसे पहले सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
- - इस बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- - सबसे पहले किसी बड़े पात्र में राधा रानी की मूर्ति को रखते हुए पंचामृत से स्नान कराएं।
- - इसके बाद फूल, माला, सिंदूर, अक्षत, कुमकुम, मिठाई और खीर का भोग लगाएं।
- - फिर घी का दीपक और धूप जलाकर विधि-विधान के साथ राधा रानी की पूजा करें।
- - इस दौरान राधा रानी के मंत्र, कथा, चालीसा का पाठ करते हुए आरती करें।
- - अंत में प्रसाद का वितरण करें और अगले दिन व्रत का पारण करें।
श्री राधा रानी की आरती
आरती श्री वृषभानु लली की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की...आरती श्री वृषभानु लली की।
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि ।
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानु लली की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥
मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरति सोहनि ।
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानु लली की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥
संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी ।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी, अति अमूल्य सम्पति समता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानु लली की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥
कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।
जगजननि जग दुखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानु लली की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥