संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो शिव के बिना हो। सृष्टि का आधार ही शिव है। यदि रात शिव है, तो दिन भी शिव है। सुख शिव है, तो दुख भी शिव है। देवों के देव शिव का स्वरूप चैतन्य है। शिव ही आदि हैं और वही अनंत हैं। वे योगी हैं, तो गृहस्थ जीवन के आदर्श भी। क्या स्त्री, क्या पुरुष... हर किसी के पूज्य हैं भगवान शिव। वह संहारकर्ता भी हैं और सृष्टि के रचनाकार भी। भगवान शिव असीम हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं, अविकारी हैं, निराकार हैं। जिसका व्यक्तित्व इतना विशाल हो, तो फिर मनुष्य उनसे प्रभावित तो होगा ही।
Mahashivratri 2018: भगवान शिव के भक्तों को जरूर जाननी चाहिए ये 10 बातें
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एक आदर्श पति के रूप में शिव
शिवजी आदर्श पति कैसे हैं?, इस सवाल का जवाब है शिवजी का व्यक्तित्व, उनका भावुक मिजाज और तपस्वी स्वभाव। वह व्यक्ति भगवान ही होता है, जो अपनी भावनाओं पर संयम रख सके। फिर शिवजी तो साक्षात् भगवान ही हैं, उनमें यह खूबी मौजूद है। भगवान शिव अपनी पत्नी के प्रति संपूर्ण भावनाओं से समर्पित हैं। भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से प्यार, आदर और समानता के साथ पेश आते हैं। वे अपनी पत्नी पार्वती को अपने साथ बगल में बैठाते हैं, न कि अपने चरणों के पास। अपनी पत्नी को उन्होंने हमेशा बराबरी का महत्व दिया है।
उन्हें कभी अपने अधीन नहीं माना। पति-पत्नी के रूप में भगवान शिव और मां पार्वती की अनूठी जोड़ी की इस संसार में किसी भी प्रकार से तुलना नहीं की जा सकती। यही भगवान शिव की कुछ विशेषताएं हैं, जो उन्हें आदर्श पति के रूप में स्थापित करती हैं, इसलिए आज भी अविवाहित लड़कियां पति के रूप में भगवान शिव जैसे व्यक्ति की कामना करती हैं।
शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। उनमें किसी चीज को लेकर स्वीकृति भी है और अस्वीकृति भी। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्द्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। भगवान शिव में किसी चीज की रचना करने और उसे नष्ट करने की भी क्षमता है। संसार की सारी विषमताओं से घिरे होने के बावजूद अपनी चित्तवृत्ति को शांत एवं स्थिर बनाए रखना ही योग का स्वरूप है और भगवान शिव हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं। वे हमें जीवन में संतुलन का पाठ पढ़ाते हैं।
निष्पक्षता का पाठ
भगवान शिव सभी के प्रति निष्पक्ष भाव रखते हैं। चाहे देव हो या दानव। देवदूत हो या प्रेत। भगवान शिव के लिए उनका साधक एक भक्त ही है। यह मायने नहीं रखता कि वह कौन है? अगर कोई भी सच्ची भक्ति के साथ उनकी आराधना करे, तो वे सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। चाहे वह दिल से राक्षस ही क्यों न हो? भगवान शिव की इसी विशेषता के लिए उन्हें 'भोलेनाथ' के नाम से भी पुकारा जाता है। अर्थात् भगवान शिव देवों और दैत्यों में किसी भी प्रकार का भेद नहीं करते हैं।
नृत्य के देवता
भगवान शिव नृत्य के भगवान हैं, इसलिए उनका एक नाम नटराज भी है। नटराज को नृत्य का देवता मानते हैं। आमतौर पर भगवान शिव को विनाश के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन बहुत ही कम लोग यह जानते हैं कि शिवजी को संगीत और नृत्य से प्यार है। शिव के नटराज स्वरूप का एक संदेश यह भी है कि अज्ञानता को ज्ञान, संगीत और नृत्य से ही दूर किया जा सकता है। शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनके क्रोध को दिखाता है और दूसरा आनंद प्रदान करने वाला तांडव।
धर्म ग्रंथों के मतानुसार, शिव के आनंद तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है। नटराज का जो पांव उठा हुआ है, वह मोक्ष को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव देते हैं। कहा जाता है कि शिव के चरणों में मोक्ष है और जो बौना शिव के पैरों तले दबा हुआ है, वह अज्ञान का प्रतीक है। शिव जी अज्ञान का विनाश करते हैं।